कौन थे Vinayak Damodar Savarkar? हिंदुत्व की विचारधारा और क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के प्रणेता की अनकही गाथा।
सेलुलर जेल की यातनाएं, अभिनव भारत सोसाइटी की स्थापना और भारतीय राजनीति पर स्वातंत्र्यवीर सावरकर के स्थायी प्रभाव का विस्तृत विश्लेषण।

विनायक दामोदर सावरकर भारतीय स्वाधीनता संग्राम के एक ऐसे तेजस्वी और विवादास्पद व्यक्तित्व रहे हैं, जिनकी लेखनी और क्रांतिकारी गतिविधियों ने ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ों को हिलाकर रख दिया था। 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के भागुर गाँव में दामोदर और राधाबाई सावरकर के घर जन्मे विनायक का झुकाव बचपन से ही राष्ट्रवाद की ओर था। मात्र 12 वर्ष की आयु में उन्होंने सांप्रदायिक दंगों के दौरान अपने साहसी और आक्रामक तेवरों का परिचय दिया और 1903 में अपने भाई गणेश सावरकर के साथ मिलकर 'मित्र मेला' नामक गुप्त क्रांतिकारी संगठन की नींव रखी, जो आगे चलकर 1906 में 'अभिनव भारत सोसाइटी' के रूप में प्रसिद्ध हुआ। पुणे के फर्गुसन कॉलेज में शिक्षा के दौरान वे लोकमान्य तिलक के क्रांतिकारी विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुए और उन्हीं के मार्गदर्शन में विदेशी कपड़ों की होली जलाकर ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी। तिलक के सहयोग से शिवाजी छात्रवृत्ति पाकर वे कानून की पढ़ाई करने लंदन गए, जहाँ उन्होंने 'इंडिया हाउस' और 'फ्री इंडिया सोसाइटी' के माध्यम से भारतीय छात्रों को संगठित किया। इसी प्रवास के दौरान उन्होंने 'द इंडियन वार ऑफ इंडिपेंडेंस 1857' जैसी ऐतिहासिक पुस्तक लिखी, जिसने 1857 के विद्रोह को 'सिपाही विद्रोह' के बजाय भारत का 'प्रथम स्वाधीनता संग्राम' सिद्ध किया, जिसके कारण ब्रिटिश सरकार ने इसे प्रकाशित होने से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया।
लंदन में सावरकर की सक्रियता और क्रांतिकारी मदनलाल धींगरा जैसे युवाओं पर उनके प्रभाव से अंग्रेज सरकार भयभीत हो गई। 1910 में उन्हें लंदन में गिरफ्तार कर भारत डिपोर्ट किया जा रहा था, तभी मार्सेली (फ्रांस) के पास वे जहाज की खिड़की से समुद्र में कूद गए और तैरकर फ्रांसीसी तट पर पहुँच गए, जो अंतरराष्ट्रीय कानून के इतिहास में एक प्रसिद्ध घटना बन गई। अंततः उन्हें दोबारा गिरफ्तार कर भारत लाया गया और नासिक षड्यंत्र केस में दोहरे आजीवन कारावास की सजा सुनाकर अंडमान की कुख्यात सेलुलर जेल (काला पानी) भेज दिया गया। जेल की अमानवीय यातनाओं के बीच उन्होंने दीवारों पर कोयले और नाखूनों से कविताएं लिखीं। वर्षों के संघर्ष के बाद, उन्होंने ब्रिटिश सरकार को कई दया याचिकाएं भेजीं, जिनमें उन्होंने संवैधानिक मार्ग अपनाने का आश्वासन दिया, जिसके परिणामस्वरूप 1924 में उन्हें रत्नागिरी जेल से सशर्त रिहा किया गया, लेकिन 1937 तक उनकी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा रहा। इसी दौरान उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'हिंदुत्व' लिखी, जिसमें उन्होंने 'हिंदू' शब्द को एक सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान के रूप में परिभाषित करते हुए 'हिंदू राष्ट्र' की अवधारणा प्रस्तुत की।
जेल से पूर्णतः मुक्त होने के बाद सावरकर हिंदू महासभा के एक प्रभावशाली अध्यक्ष के रूप में उभरे। उन्होंने 'हिंदू राजनीति का हिंदूकरण और हिंदुओं का सैन्यीकरण' का नारा दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने कांग्रेस के 'भारत छोड़ो आंदोलन' का विरोध किया और हिंदुओं को ब्रिटिश सेना में भर्ती होने के लिए प्रोत्साहित किया ताकि वे युद्ध कला सीख सकें। उन्होंने मुस्लिम लीग की अलगाववादी नीतियों के जवाब में दो-राष्ट्र सिद्धांत का समर्थन करते हुए भारत को एक अखंड हिंदू राष्ट्र बनाने पर जोर दिया। स्वाधीनता के पश्चात, 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के मामले में उन्हें सह-षड्यंत्रकारी के रूप में आरोपी बनाया गया, परंतु साक्ष्यों के अभाव में न्यायालय ने उन्हें ससम्मान बरी कर दिया। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने समाज सुधार और जाति व्यवस्था के उन्मूलन पर कार्य किया, हालांकि उनके विचार कई बार तत्कालीन राजनेताओं से भिन्न रहे। 26 फरवरी 1966 को उन्होंने 'प्रायोपवेश' (इच्छा मृत्यु हेतु उपवास) के माध्यम से अपने प्राण त्याग दिए। सावरकर का जीवन साहस, बौद्धिक प्रखरता और प्रखर राष्ट्रवाद का एक ऐसा अध्याय है, जो आज भी भारतीय राजनीति और इतिहास में गहन विमर्श और प्रेरणा का केंद्र बना हुआ है।

