कौन थे विजय सिंह पथिक? भारत के पहले किसान सत्याग्रह और बिजोलिया आंदोलन के महानायक की अनकही गाथा
बुलंदशहर में जन्मे भूप सिंह कैसे बने विजय सिंह पथिक और राजस्थान में किसानों को हक दिलाने के लिए अंग्रेजों और सामंतों के खिलाफ छेड़ा देश का पहला बड़ा सत्याग्रह।

भारत के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में कुछ ऐसे महानायक हुए जिन्होंने न केवल विदेशी हुकूमत की नींव हिला दी, बल्कि समाज के सबसे शोषित वर्ग यानी किसानों को उनके अधिकारों के लिए लड़ना सिखाया। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के गुठवावली कलां गाँव में 27 फरवरी 1872 को एक गुर्जर परिवार में जन्मे भूप सिंह, जिन्हें दुनिया विजय सिंह पथिक के नाम से जानती है, एक ऐसी ही प्रखर शख्सियत थे। उनके रगों में देशभक्ति का खून विरासत में मिला था; उनके दादा इंद्र सिंह 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में मालागढ़ रियासत के दीवान रहते हुए अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हुए थे और उनके पिता हमीर सिंह गुर्जर को भी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण बंदी बनाया गया था। अपनी माता कमल कुमारी के संस्कारों और पारिवारिक पृष्ठभूमि से प्रभावित होकर पथिक ने युवावस्था में ही रास बिहारी बोस और सचिंद्र नाथ सान्याल जैसे दिग्गज क्रांतिकारियों के साथ मिलकर सशस्त्र क्रांति का मार्ग चुन लिया। 1912 में लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंकने की घटना हो या 1915 का लाहौर षड्यंत्र, पथिक हर मोर्चे पर सक्रिय रहे। फिरोजपुर षड्यंत्र के बाद अपनी पहचान छिपाने के लिए उन्होंने अपना नाम भूप सिंह से बदलकर विजय सिंह पथिक रख लिया और राजस्थान को अपनी कर्मभूमि बनाया। टाडगढ़ किले से अंग्रेजों की आँखों में धूल झोंककर फरार होने के बाद उन्होंने एक राजस्थानी राजपूत का भेष धारण किया और चित्तौड़गढ़ के पास रहने लगे, जहाँ साधु सीताराम दास के आग्रह पर उन्होंने बिजोलिया किसान आंदोलन की कमान संभाली।
विजय सिंह पथिक ने बिजोलिया के किसानों पर लगने वाले 84 प्रकार के दमनकारी करों और बेगार प्रथा के विरुद्ध एक अभूतपूर्व जन-जाग्रति पैदा की। उन्होंने गाँव-गाँव में किसान पंचायतों की शाखाएं खोलीं और 1917 की रूसी क्रांति से प्रेरित होकर किसानों को सत्ता में उनकी भागीदारी का अहसास कराया। उनके संपादन में निकलने वाले 'प्रताप' अखबार और बाद में 'राजस्थान केसरी' व 'नवीन राजस्थान' ने बिजोलिया आंदोलन की गूँज पूरे देश में फैला दी। पथिक के प्रयासों का ही परिणाम था कि बाल गंगाधर तिलक ने अमृतसर कांग्रेस में बिजोलिया के समर्थन में प्रस्ताव रखा और स्वयं महात्मा गांधी ने उनके कार्यों की सराहना करते हुए उन्हें एक सच्चा सिपाही बताया। जब गांधी जी ने किसानों को क्षेत्र छोड़ने की सलाह दी, तो पथिक ने दो टूक शब्दों में उसे ठुकराते हुए कहा कि यह वीरों का मार्ग नहीं है। उनके नेतृत्व में बेगू, पारसोली और उदयपुर जैसे क्षेत्रों में भी किसान आंदोलनों की लहर दौड़ गई, जिससे भयभीत होकर ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा और ए.जी.जी. हॉलैंड के माध्यम से किसानों की अधिकांश मांगें मान ली गईं। एक महान क्रांतिकारी होने के साथ-साथ पथिक एक उच्च कोटि के लेखक और कवि भी थे; 'अजय मेरु' उपन्यास और 'पथिक प्रमोद' जैसी उनकी रचनाएं उनके बौद्धिक कौशल का प्रमाण हैं। जीवन के उत्तरार्ध में भी उन्होंने राष्ट्र सेवा को सर्वोपरि रखा और 28 मई 1954 को जब इस महान 'राष्ट्रीय पथिक' का अवसान हुआ, तब उनके पास निजी संपत्ति के नाम पर कुछ नहीं था, जबकि उनके कई शिष्य राजनीति के ऊँचे पदों पर आसीन थे। विजय सिंह पथिक का जीवन निस्वार्थ सेवा, अदम्य साहस और किसानों की गरिमा के लिए समर्पित रहा, जो आज भी भारतीय राजनीति और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में एक प्रकाश स्तंभ की तरह है।

