मध्यकालीन भारतीय इतिहास के पन्नों में सम्राट विग्रहराज चतुर्थ एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र के समान हैं, जिनकी तलवार की खनक और कलम की धार ने उत्तर भारत को एक नई दिशा दी। लगभग 1150 से 1164 ईस्वी के बीच शासन करने वाले चाहमान (चौहान) राजवंश के इस प्रतापी शासक को 'बीसलदेव' के नाम से भी जाना जाता है। विग्रहराज का राज्यारोहण एक चुनौतीपूर्ण कालखंड में हुआ था, जब उन्होंने अपने पिता अर्णोराज की हत्या का प्रतिशोध लेने के लिए अपने भाई जगद्देव को अपदस्थ कर सत्ता संभाली थी। उन्होंने न केवल अपने साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार किया बल्कि उसे एक सुदृढ़ और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध साम्राज्य में परिवर्तित कर दिया। विग्रहराज चतुर्थ का व्यक्तित्व सैन्य कौशल और साहित्यिक प्रतिभा का एक दुर्लभ संगम था, जिसके कारण उन्हें 'कवि बांधव' की उपाधि से विभूषित किया गया था।

सम्राट विग्रहराज की सैन्य उपलब्धियों ने उन्हें 'आर्यावर्त' के रक्षक के रूप में स्थापित किया। उन्होंने दिल्ली के तोमर शासकों को पराजित कर दिल्ली पर चौहानों का आधिपत्य स्थापित किया, जो भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। उनके विजय अभियान यहीं नहीं रुके; उन्होंने गुजरात के चालुक्यों को धूल चटाई और जाबालिपुर (जालोर), पल्लिका (पाली) तथा नड्डुल (नाडोल) जैसे क्षेत्रों को जीतकर अपनी शक्ति का लोहा मनवाया। उत्तर में हिमालय की तलहटी से लेकर दक्षिण में विंध्य पर्वतमाला तक उनके प्रभाव की गूँज थी। विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध उनका प्रतिरोध अत्यंत सराहनीय रहा, जहाँ उन्होंने गजनी के तुर्क आक्रमणकारियों बहराम शाह और खुसरो शाह को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। दिल्ली-शिवालिक स्तंभ लेख इस बात का जीवंत प्रमाण है कि उन्होंने म्लेच्छों का विनाश कर आर्यावर्त की पवित्रता को पुनर्स्थापित करने का प्रण लिया था।

एक अजेय योद्धा होने के साथ-साथ विग्रहराज चतुर्थ कला और स्थापत्य के महान संरक्षक थे। उन्होंने अपनी राजधानी अजयमेरु (वर्तमान अजमेर) में एक भव्य संस्कृत शिक्षण केंद्र का निर्माण कराया था, जहाँ पत्थरों पर उनके द्वारा रचित 'हरकेलि' नाटक के अंश आज भी उनकी साहित्यिक उत्कृष्टता की गवाही देते हैं। उन्होंने बीसलपुर जैसे नगरों और बीसलसर जैसी विशाल झीलों का निर्माण कराकर जन-कल्याण और स्थापत्य कला को नए आयाम दिए। धार्मिक रूप से उदार सम्राट ने जैन विद्वानों का भी सम्मान किया और उनके अनुरोध पर एकादशी के दिन पशु वध पर रोक लगाई। उनके शासनकाल को सपादलक्ष (चौहान साम्राज्य) का 'स्वर्ण युग' कहा जाता है, जहाँ प्रजा सुरक्षित थी और विद्वानों को राज्याश्रय प्राप्त था।

विग्रहराज चतुर्थ का व्यक्तित्व भारतीय इतिहास की उस गौरवशाली परंपरा का प्रतीक है जहाँ एक राजा न केवल सीमाओं की रक्षा करता है, बल्कि अपनी संस्कृति और ज्ञान की विरासत को भी सहेजता है। उनका शासन अल्पकालिक रहा, किंतु उनके द्वारा स्थापित सैन्य और सांस्कृतिक नींव ने ही आगे चलकर उनके उत्तराधिकारी पृथ्वीराज चौहान तृतीय को एक सुदृढ़ साम्राज्य सौंपा। सम्राट विग्रहराज का जीवन साहस, न्यायप्रियता और बौद्धिक श्रेष्ठता की एक ऐसी गाथा है जो सदियों बाद भी भारतीय जनमानस को प्रेरित करती रहती है। उनकी विरासत आज भी अजमेर की ऐतिहासिक इमारतों और प्राचीन शिलालेखों में जीवंत है, जो उन्हें मध्यकालीन भारत के महानतम सम्राटों की पंक्ति में अग्रगण्य बनाती है।

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