कौन थे कान्हापात्रा? भक्ति और आत्मसम्मान की वह अमर गाथा जिसने राजवंश को चुनौती दी
15वीं सदी की कवयित्री कान्हापात्रा ने सामाजिक रूढ़ियों को ठुकराकर भगवान विठोबा के प्रति अनन्य भक्ति का परिचय दिया और पंढरपुर मंदिर में समाधि ली।

15वीं शताब्दी के महाराष्ट्र की पावन भूमि पर जब भक्ति आंदोलन अपनी चरम सीमा पर था, तब एक ऐसी संत-कवयित्री का प्रादुर्भाव हुआ जिसने सामाजिक रूढ़ियों और राजसी वैभव को ठुकराकर ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम का एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। वारकरी संप्रदाय में अत्यंत पूजनीय स्थान रखने वाली कान्हापात्रा की कहानी केवल ईश्वर के प्रति समर्पण की नहीं, बल्कि अपने आत्मसम्मान और गरिमा की रक्षा के लिए किए गए एक असाधारण संघर्ष की गाथा है। पंढरपुर के मुख्य विठोबा मंदिर के प्रांगण में आज भी मौजूद उनकी समाधि इस बात की गवाही देती है कि सच्ची भक्ति किसी जाति, परंपरा या सामाजिक वर्ग की मोहताज नहीं होती। कान्हापात्रा का जन्म पंढरपुर के निकट मंगलवेधा नामक शहर में श्यामा नाम की एक संपन्न और प्रसिद्ध गणिका के घर हुआ था। यह वही ऐतिहासिक नगर है जिसने चोखामेला और दामाजी जैसे महान वारकरी संतों को भी जन्म दिया। श्यामा को कान्हापात्रा के पिता की पहचान को लेकर निश्चितता नहीं थी, हालांकि उन्हें संदेह था कि नगर के प्रधान सदाशिव मालगुजार ही उनके पिता थे। कई दास-दासियों से घिरे एक भव्य महलनुमा घर में बचपन बीतने के बावजूद, अपनी मां के व्यवसाय के कारण कान्हापात्रा को समाज में बेहद हीन और अपमानजनक दृष्टिकोण का सामना करना पड़ा।
बचपन से ही कान्हापात्रा को नृत्य और संगीत की शिक्षा दी गई ताकि वह अपनी मां के पेशे को आगे बढ़ा सकें। वह जल्द ही एक अत्यंत प्रतिभाशाली नृत्यांगना और गायिका के रूप में उभरकर सामने आईं। उनकी सुंदरता इस कदर अद्वितीय थी कि उनकी तुलना स्वर्ग की अप्सरा मेनका से की जाती थी। श्यामा चाहती थी कि कान्हापात्रा उस समय के शक्तिशाली सुल्तान से मुलाकात करे, जो उसकी सुंदरता पर मोहित होकर उसे असीम धन-दौलत और आभूषण भेंट कर सके, लेकिन कान्हापात्रा ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। पारंपरिक कथाओं के अनुसार, श्यामा अपनी बेटी का विवाह भी कराना चाहती थी, परंतु कान्हापात्रा ने प्रतिज्ञा की थी कि वह केवल उसी पुरुष से विवाह करेगी जो उससे भी अधिक सुंदर हो। इतिहासकार और विद्वान इस बात को भी रेखांकित करते हैं कि उस दौर में गणिका की पुत्री होने के कारण समाज में उनका विवाह वैसे भी वर्जित और अस्वीकार्य था। कान्हापात्रा को उस दलदल में धकेलने का हरसंभव प्रयास किया गया जिससे वह तीव्र घृणा करती थीं, लेकिन उन्होंने एक गणिका के रूप में जीवन जीने से पूरी तरह इनकार कर दिया। इसी बीच, उनकी सुंदरता की ख्याति सुनकर उनके कथित पिता सदाशिव मालगुजार ने उनका नृत्य देखने की इच्छा प्रकट की। जब कान्हापात्रा ने मना कर दिया, तो सदाशिव ने उन्हें और उनकी मां को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। इस उत्पीड़न के कारण धीरे-धीरे श्यामा की सारी संपत्ति समाप्त हो गई, जिसके बाद विवश होकर श्यामा ने सदाशिव से क्षमा मांगते हुए कान्हापात्रा को उन्हें सौंपने का मन बना लिया। मगर कान्हापात्रा इस अपमान को सहन करने के बजाय अपनी वृद्ध दासी हौसा की सहायता से एक दासी का भेष बदलकर चुपचाप पंढरपुर की ओर भाग निकलीं।
कान्हापात्रा के भक्ति मार्ग पर अग्रसर होने के पीछे उनकी दासी हौसा और उनके घर के सामने से गुजरने वाले वारकरी तीर्थयात्रियों की बड़ी भूमिका रही। एक बार जब उन्होंने राह चलते वारकरी श्रद्धालुओं से भगवान विठोबा के विषय में पूछा, तो उन्हें उत्तर मिला कि विठोबा अत्यंत दयालु, बुद्धिमान, सुंदर और पूर्ण हैं, जिनकी सुंदरता के आगे सौंदर्य की देवी लक्ष्मी का रूप भी फीका पड़ जाता है। जब व्याकुल कान्हापात्रा ने पूछा कि क्या विठोबा जैसी पावन चेतना मुझ जैसी स्त्री को अपनी भक्त के रूप में स्वीकार करेगी, तब श्रद्धालुओं ने उन्हें आश्वस्त किया कि भगवान ने कुब्जा, पापी राजा अजामिल और अछूत माने जाने वाले संत चोखामेला को भी अपनाया है, तो वे उन्हें क्यों नहीं अपनाएंगे। इस सांत्वना ने उनके संकल्प को दृढ़ कर दिया और वे विठोबा के भजनों को गाते हुए पंढरपुर पहुँच गईं। जब उन्होंने पहली बार पंढरपुर में भगवान विठोबा के विग्रह के दर्शन किए, तो उनके मुख से अनायास ही अभंग फूट पड़े कि उनके जीवन का आध्यात्मिक उद्देश्य पूर्ण हो गया है। जिस अद्वितीय सौंदर्य वाले वर की खोज उन्हें थी, वह रूप उन्हें विठोबा में मिल गया। उन्होंने स्वयं को ईश्वर को समर्पित कर दिया और दुनिया से नाता तोड़कर एक छोटी सी कुटिया में वैरागी जीवन जीने लगीं। वह प्रतिदिन दो बार मंदिर की सफाई करतीं और विठोबा के सामने नृत्य व गायन करतीं, जिससे स्थानीय लोग भी उन्हें एक विठोबा के प्रेम में दीवानी निष्पाप आत्मा मानकर उनका सम्मान करने लगे।
इसी दौरान, अपमान की आग में जल रहे सदाशिव मालगुजार ने बीदर के सुल्तान से सहायता मांगी। कान्हापात्रा की अलौकिक सुंदरता की कहानियां सुनकर बीदर के सुल्तान ने उन्हें अपनी रखैल बनाने का आदेश दे दिया और जब उन्होंने इनकार किया, तो सुल्तान ने बलपूर्वक उन्हें बंदी बनाने के लिए अपनी सेना भेज दी। भयभीत कान्हापात्रा ने भागकर विठोबा के मंदिर में शरण ली। सुल्तान के सैनिकों ने पूरे मंदिर को घेर लिया और धमकी दी कि यदि कान्हापात्रा को उन्हें नहीं सौंपा गया, तो वे मंदिर को पूरी तरह नष्ट कर देंगे। इस विकट परिस्थिति में कान्हापात्रा ने सैनिकों से सुल्तान के पास चलने से पहले विठोबा से एक अंतिम मुलाकात की अनुमति मांगी और गर्भगृह में प्रवेश कर गईं। इसके बाद जो हुआ वह आज भी रहस्य और परम श्रद्धा का विषय है, क्योंकि कान्हापात्रा ने विठोबा के चरणों में ही अपने प्राण त्याग दिए। लोक मान्यताओं के अनुसार, वे विठोबा की मूर्ति में ही विलीन हो गईं, जो कि ईश्वर से विवाह करने की उनकी अंतिम इच्छा थी। उनकी अंतिम इच्छानुसार उनके पार्थिव शरीर को विठोबा के चरणों में रखने के बाद मंदिर के दक्षिणी हिस्से में दफनाया गया, जहाँ से बाद में एक पवित्र तरती का वृक्ष उत्पन्न हुआ, जिसकी पूजा आज भी भक्तगण करते हैं। विभिन्न इतिहासकारों के अनुसार यह घटना 15वीं शताब्दी की है, और कुछ विद्वान उनकी मृत्यु का वर्ष 1480 ईस्वी मानते हैं।
कान्हापात्रा द्वारा रचित केवल तीस अभंग और ओवियाँ ही आज जीवित रूप में हमारे पास उपलब्ध हैं, जो उनकी आत्मकथात्मक पीड़ा और अगाध भक्ति को दर्शाती हैं। उनके गीतों में अपनी अस्मिता को बचाने का संघर्ष, समाज द्वारा एक केवल सुंदर वस्तु समझे जाने की आत्मग्लानि और ईश्वर से स्वयं को इस दलदल से मुक्त कराने की आर्तपुकार स्पष्ट दिखाई देती है। उन्होंने अपने अंतिम अभंग में विठोबा को पतित पावन पुकारते हुए अपने प्राण उनके चरणों में सौंप दिए। महान संत तुकाराम ने भी समाज में जाति व्यवस्था पर प्रहार करने के लिए कान्हापात्रा का उदाहरण दिया कि ईश्वर की भक्ति में सामाजिक वर्गीकरण पूरी तरह निरर्थक है। कान्हापात्रा पूरे महाराष्ट्र के इतिहास में इसलिए अद्वितीय हैं क्योंकि वे बिना किसी पारंपरिक पारिवारिक पृष्ठभूमि, बिना किसी गुरु, बिना किसी पुरुष संत के सहयोग या बिना किसी गुरु-शिष्य परंपरा के केवल अपनी अनन्य और तीव्र भक्ति के बल पर संत पद तक पहुँचीं। उनकी इस गौरवशाली और प्रेरणादायक जीवन यात्रा को 1931 के नाटक 'संत कान्हापात्रा' और 1937 की मराठी फिल्म के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया गया। आज भी वारकरी संप्रदाय के लोग पंढरपुर की अपनी वार्षिक यात्रा के दौरान उनके रचे अभंगों को अत्यंत श्रद्धा के साथ गाते हैं, जो उनके आध्यात्मिक वैभव और स्वाभिमान की अमर विरासत को जीवंत बनाए रखता है।

