छठी शताब्दी के उज्जैन की धरती एक ऐसे विद्वान के उदय की साक्षी बनी, जिसने भारतीय खगोल विज्ञान और गणित को एक नया क्षितिज प्रदान किया। वराहमिहिर, जिन्हें वराह या मिहिर के नाम से भी जाना जाता है, प्राचीन भारत के उन नक्षत्रों में से थे, जिनकी चमक आज भी आधुनिक विज्ञान के गलियारों में महसूस की जा सकती है। अवंती (वर्तमान उज्जैन) के निवासी वराहमिहिर का जन्म संभवतः सन 505 के आसपास हुआ था। उनके पिता आदित्यदास स्वयं एक कुशल ज्योतिषी थे, जिन्होंने मिहिर को प्रारंभिक शिक्षा दी। अपनी प्रखर बुद्धि और सूर्य देव की विशेष कृपा के कारण, उन्हें 'मिहिर' की उपाधि मिली, जिसका अर्थ 'सूर्य' होता है। ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार, वे मगध के उन 'मगा' ब्राह्मणों के वंशज थे जो मूल रूप से ईरान के सौर-पूजक पुरोहितों से संबंधित थे। यही कारण है कि उनके ज्ञान में वैश्विक दृष्टिकोण और विभिन्न संस्कृतियों का समावेश दिखाई देता है।

वराहमिहिर का जीवन केवल ज्योतिष तक सीमित नहीं था; वे एक महान गणितज्ञ और खगोलशास्त्री भी थे। उन्होंने प्रसिद्ध 'पंचसिद्धांतिका' की रचना की, जो उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। इस ग्रंथ में उन्होंने अपने समय के पांच प्रमुख खगोलशास्त्रीय सिद्धांतों का संकलन और विश्लेषण किया। उन्होंने महान आर्यभट्ट के कार्यों का भी उल्लेख किया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वे उनके बाद के काल के थे। यद्यपि कुछ लोककथाएं उन्हें सम्राट विक्रमादित्य के 'नवरत्नों' में से एक बताती हैं, किंतु ऐतिहासिक शोधों से पता चलता है कि वे गुप्त और औलिकर राजवंशों के काल में सक्रिय थे। राजा द्रव्यवर्धन को उनका शाही संरक्षक माना जाता है, जिनके शासनकाल में उन्होंने अपनी शोध और लेखन को नई ऊंचाइयां दीं।

उनकी लेखनी केवल तथ्यों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसमें काव्य का माधुर्य भी था। उन्होंने फलित ज्योतिष पर 'वृहज्जातक' और 'लघुजातक' जैसे प्रामाणिक ग्रंथ लिखे, जो आज भी ज्योतिषियों के लिए आधार स्तंभ हैं। 'वृहत्संहिता' में उन्होंने न केवल ग्रहों की चाल का वर्णन किया, बल्कि वास्तुकला, मूर्तिकला, मौसम विज्ञान और कृषि जैसे विषयों पर भी व्यापक प्रकाश डाला। वराहमिहिर एक उदारवादी विचारक थे; उन्होंने ब्राह्मणवादी देवताओं के साथ-साथ बुद्ध और जैन तीर्थंकरों की प्रतिमा विज्ञान का भी सम्मानपूर्वक वर्णन किया। उन्होंने यूनानी (यवन) विज्ञान की प्रशंसा की और विदेशी वैज्ञानिक शब्दावलियों को संस्कृत में ढालकर भारतीय ज्ञान को और अधिक समृद्ध किया। उनका मानना था कि विज्ञान की कोई सीमा नहीं होती और जहाँ से भी ज्ञान मिले, उसे ग्रहण करना चाहिए।

सन 587 के आसपास जब इस महान मनीषी ने अपनी देह त्यागी, तब तक वे भारतीय विज्ञान की धारा को पूरी तरह बदल चुके थे। उनके बाद आने वाले खगोलशास्त्रियों, जैसे ब्रह्मगुप्त और बाद में अल-बिरूनी, ने भी उनकी विद्वता का लोहा माना। अल-बिरूनी ने उन्हें एक "उत्कृष्ट खगोलशास्त्री" के रूप में वर्णित किया। वराहमिहिर का सबसे बड़ा योगदान यह रहा कि उन्होंने परंपरा और तर्क का ऐसा समन्वय किया जिसने भारतीय खगोल विज्ञान को अंधविश्वास से निकालकर गणितीय सटीकता की ओर अग्रसर किया। उनकी विरासत आज भी हमारे कैलेंडर, पंचांग और अंतरिक्ष विज्ञान के बुनियादी सिद्धांतों में जीवित है, जो हमें याद दिलाती है कि प्राचीन भारत ज्ञान और विज्ञान का विश्वगुरु क्यों था।

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