कौन थे उमादे भटियाणी? मारवाड़ की वह 'रूठी रानी' जिन्होंने स्वाभिमान के लिए त्याग दिया राजसी सुख
जैसलमेर की राजकुमारी उमादे भटियाणी के राव मालदेव से विवाद, तारागढ़ में एकाकी जीवन और पति के निधन पर सती होने की ऐतिहासिक गाथा।

अपने आत्मसम्मान और अडिग निर्णय के लिए इतिहास में 'रूठी रानी' के नाम से अमर होने वाली रानी उमादे का जीवन शौर्य, त्याग और स्वाभिमान की एक अद्वितीय गाथा है।
जैसलमेर के रावल लूणकरण भाटी की पुत्री और मारवाड़ के प्रतापी शासक राव मालदेव राठौड़ की द्वितीय पत्नी उमादे भटियाणी का व्यक्तित्व राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास में अपनी एक विशिष्ट और अमिट छाप छोड़ता है। उमादे का जन्म जैसलमेर के भाटी राजपूत राजवंश में हुआ था और उनकी छोटी बहन रानी धीरूभाई भी इतिहास के पन्नों में अपनी पहचान रखती हैं। उमादे और राव मालदेव का विवाह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक गठबंधन के रूप में देखा गया था, परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था। विवाह की पहली ही रात कुछ ऐसी परिस्थितियाँ बनीं कि रानी उमादे अपने पति राव मालदेव से इस कदर नाराज हुईं कि उन्होंने जीवन भर उनसे दूरी बनाए रखने का कठोर संकल्प ले लिया। उनके इसी अडिग निश्चय और पति से विमुख रहने के कारण लोक परंपरा और इतिहास में उन्हें 'रूठी रानी' के नाम से संबोधित किया जाने लगा।
रानी उमादे ने अपना अधिकांश जीवन अजमेर के तारागढ़ किले में व्यतीत किया, जहाँ उन्होंने राजसी ऐश्वर्य और सुख-सुविधाओं का परित्याग कर एक तपस्विनी जैसा जीवन जिया। राव मालदेव ने उन्हें मनाने के कई प्रयास किए और उन्हें वापस जोधपुर बुलाने के लिए संदेश भी भेजे, लेकिन रानी ने अपने स्वाभिमान को सर्वोपरि रखते हुए कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि एक राजपूत स्त्री के लिए उसका सम्मान और गौरव किसी भी साम्राज्य या राजमुकुट से कहीं अधिक कीमती होता है। वर्ष 1562 में जब राव मालदेव का निधन हुआ, तब रानी उमादे ने अपने मतभेदों को पीछे छोड़कर एक क्षत्राणी की परंपरा का निर्वहन किया और उनकी पगड़ी के साथ सती होकर वीरगति प्राप्त की। उमादे भटियाणी का बलिदान और उनका दृढ़ चरित्र आज भी मारवाड़ और जैसलमेर की मिट्टी में गौरव के साथ याद किया जाता है, जो आने वाली पीढ़ियों को आत्मसम्मान की रक्षा करने की प्रेरणा देता रहता है।

