कौन थे ठाकुर केसरी सिंह बारहट? राजस्थान के उस 'शेर' की कहानी जिसने आजादी के लिए अपना पूरा परिवार होम कर दिया
मेवाड़ महाराणा को चेतावनी रा चूंगट्या लिखने वाले क्रांतिकारी केसरी सिंह बारहट और उनके परिवार के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में योगदान का पूरा इतिहास।

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में ठाकुर केसरी सिंह बारहट एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी राष्ट्रभक्ति और त्याग की मिसाल ढूंढ पाना असंभव है। 'राजस्थान केसरी' के नाम से विख्यात इस महान क्रांतिकारी का जन्म 21 नवंबर 1872 को शाहपुरा रियासत के देवखेड़ा ठिकाने में ठाकुर कृष्ण सिंह बारहट के घर हुआ था। शैशव काल में ही मातृछाया छिन जाने के बाद उनका पालन-पोषण उनकी दादी माता श्रृंगार कंवर ने अत्यंत स्नेह और संस्कारों के साथ किया, जिससे उनमें बचपन से ही ओजस्वी गुणों का संचार हुआ। उनकी शिक्षा-दीक्षा संस्कृत की शास्त्रीय परंपरा में हुई, जहाँ उन्होंने अमरकोश जैसे ग्रंथों को कंठस्थ करने के साथ-साथ बंगाली, मराठी, गुजराती, ज्योतिष और खगोल विज्ञान में भी महारत हासिल की। केसरी सिंह केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि एक प्रकांड विद्वान, कवि और दूरदर्शी विचारक थे, जिनका मानना था कि कलम और तलवार दोनों का उद्देश्य राष्ट्र की मुक्ति होना चाहिए।
केसरी सिंह बारहट के जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ वर्ष 1903 में आया, जब मेवाड़ के महाराणा फतेह सिंह दिल्ली दरबार में शामिल होने जा रहे थे। ब्रिटिश सत्ता के प्रति महाराणा के इस झुकाव को रोकने के लिए केसरी सिंह ने राजस्थानी भाषा के प्रसिद्ध 13 सोरठों 'चेतावनी रा चूंगट्या' की रचना की, जिसकी ओजपूर्ण पंक्तियों ने महाराणा के स्वाभिमान को इस कदर झकझोरा कि उन्होंने दिल्ली पहुँचकर भी दरबार में शामिल न होने का साहसिक निर्णय लिया। इसके पश्चात, केसरी सिंह ने रासबिहारी बोस, लाला हरदयाल और अर्जुनलाल सेठी जैसे दिग्गज क्रांतिकारियों के साथ मिलकर सशस्त्र क्रांति की नींव रखी। उनके क्रांतिकारी प्रभाव का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1912 में ब्रिटिश सीआईडी की निगरानी सूची में उनका नाम राजपूताना में सबसे ऊपर था।
देशभक्ति की इस राह में केसरी सिंह ने जो व्यक्तिगत बलिदान दिए, वे रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। 2 मार्च 1914 को उन्हें दिल्ली-लाहौर षड्यंत्र केस और साधु प्यारेलाल हत्याकांड के आरोप में गिरफ्तार कर 20 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई। हजारीबाग जेल की कालकोठरी में उन्होंने पाँच वर्षों तक अन्न का त्याग कर दिया ताकि पुलिस उनसे राज न उगलवा सके। इस दौरान उन्होंने 'चमवई' नामक एक नई मार्शल आर्ट पद्धति का विकास किया, जो आज भी सामरिक महत्व रखती है। उनके जेल में रहते हुए ब्रिटिश सरकार के दबाव में उनकी पैतृक संपत्ति, हवेली और यहाँ तक कि घर के बर्तन तक नीलाम कर दिए गए, जिससे उनका परिवार बेघर हो गया। दुःख की पराकाष्ठा तब हुई जब उनके पुत्र कुंवर प्रताप सिंह ने जेल की अमानवीय यातनाएं सहते हुए वीरगति प्राप्त की, लेकिन केसरी सिंह ने विचलित होने के बजाय गर्व से कहा कि 'भारत माता को आजाद कराने के लिए मेरे पुत्र ने बलिदान दिया है'।
जेल से रिहा होने के बाद भी उनका संघर्ष थमा नहीं। उन्होंने वर्धा में सेठ जमनालाल बजाज के निमंत्रण पर विजय सिंह पथिक के साथ मिलकर 'राजस्थान केसरी' पत्रिका का संपादन किया और महात्मा गांधी के संपर्क में रहकर जन-जागरूकता का कार्य जारी रखा। जीवन के अंतिम दिनों में कोटा में रहते हुए, 14 अगस्त 1941 को 'हरि ओम तत्सत' के उद्घोष के साथ इस महानायक ने अपनी अंतिम सांस ली। ठाकुर केसरी सिंह बारहट का जीवन केवल एक व्यक्ति की गाथा नहीं, बल्कि एक ऐसे कुल की कहानी है जिसके भाई जोरावर सिंह, दामाद ईश्वरी सिंह और पुत्र प्रताप सिंह सहित पूरे परिवार ने मातृभूमि की वेदी पर स्वयं को समर्पित कर दिया, जो वैश्विक इतिहास में अद्वितीय है।

