राजस्थान के सिरोही जिले में 21 जनवरी 1945 को श्री मिश्रीलाल कोठारी के आंगन में जन्मीं तारा भंडारी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा के बाद राजकीय महाविद्यालय, सिरोही से स्नातक की डिग्री प्राप्त की और यहीं से उनके भीतर सामाजिक बदलाव की नींव पड़ी। उनका विवाह 10 जून 1962 को श्री अचलमल भंडारी के साथ हुआ, जिसके बाद उन्होंने एक गृहिणी और माता के उत्तरदायित्वों को निभाते हुए समाज सेवा के क्षेत्र में कदम रखा। एक जागरूक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उनकी पहचान तब और प्रगाढ़ हुई जब उन्होंने असहायों की मदद करने, साहित्य के अध्ययन और संतों व आचार्यों के सानिध्य को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बना लिया। महिलाओं के खिलाफ होने वाले उत्पीड़न, शोषण और अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाना उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य बन गया। तारा भंडारी की राजनीतिक यात्रा जमीनी स्तर से शुरू हुई, जहाँ उन्होंने 1980 के दशक में भारतीय जनता पार्टी महिला मोर्चा, सिरोही की अध्यक्ष और फिर जिला अध्यक्ष के रूप में संगठन को मजबूती प्रदान की। उनकी नेतृत्व क्षमता का ही परिणाम था कि वे 1982 से 1986 तक सिरोही नगर परिषद की सभापति चुनी गईं और स्थानीय विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उनका संसदीय करियर 1990 में तब परवान चढ़ा जब वे नौवीं राजस्थान विधानसभा की सदस्य निर्वाचित हुईं और इसके बाद लगातार दसवीं विधानसभा (1993-98) में भी सिरोही का प्रतिनिधित्व किया। राजस्थान विधानसभा के भीतर उन्होंने न केवल लोक लेखा समिति और सामान्य प्रयोजन समिति की सदस्यता संभाली, बल्कि महिला एवं बाल कल्याण समिति की अध्यक्ष के रूप में दो कार्यकालों तक महिलाओं और बच्चों के अधिकारों के लिए नीतिगत संघर्ष किया। उनकी निष्पक्षता और सदन की कार्यवाही के गहरे ज्ञान को देखते हुए उन्हें विधानसभा के सभापति तालिका में स्थान दिया गया और अंततः 28 जुलाई 1998 को वे राजस्थान विधानसभा की उपाध्यक्ष के प्रतिष्ठित पद पर आसीन हुईं। राजनीति के साथ-साथ शैक्षणिक और प्रशासनिक क्षेत्रों में भी उनका प्रभाव व्यापक रहा, जहाँ उन्होंने जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर के सिंडिकेट सदस्य और स्वायत्त शासन संस्थान, जयपुर के सचिव के रूप में अपनी सेवाएं दीं। भारत जैन महामंडल की उपाध्यक्ष और जिला विधिक सहायता समिति की सदस्य के रूप में उन्होंने समाज के हर वर्ग को न्याय और सहायता पहुँचाने का कार्य किया।

तारा भंडारी का संपूर्ण जीवन राजनीति को जनसेवा का माध्यम बनाने की एक मिसाल है। उन्होंने केवल सत्ता के पदों को सुशोभित नहीं किया, बल्कि तेंदू पत्ता समिति और बीड़ी मजदूर समिति जैसी संस्थाओं के माध्यम से शोषित वर्ग की आवाज बनकर उभरीं। एक प्रखर वक्ता और कुशल रणनीतिकार के रूप में उन्होंने भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष बनकर पूरे राजस्थान में महिला नेतृत्व को संगठित किया। उनके ऐतिहासिक योगदान ने सिरोही जैसे क्षेत्र को राजनीतिक मानचित्र पर विशिष्ट पहचान दिलाई और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसा मार्ग प्रशस्त किया जहाँ निष्ठा और सेवा ही सफलता के असली मानक हैं। आज भी उनका व्यक्तित्व और उनके द्वारा किए गए सामाजिक सुधार राजस्थान के सार्वजनिक जीवन में एक प्रेरक विरासत के रूप में जीवित हैं।

Pratahkal HQ

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