कोलकाता के एक कुलीन बंगाली कायस्थ परिवार में १४ जनवरी १८६३ को मकर संक्रांति के उत्सव के दौरान जन्मे नरेंद्रनाथ दत्त, जिन्हें आज पूरा विश्व स्वामी विवेकानंद के नाम से जानता है, आधुनिक भारत के एक महानतम विचारक, वेदांत के प्रणेता, समाज सुधारक और लेखक थे। उनके पिता विश्वनाथ दत्त कोलकाता उच्च न्यायालय में एक वकील थे और उनकी माता भुवनेश्वरी देवी एक धार्मिक प्रवृत्ति की गृहिणी थीं। पिता के प्रगतिशील व तार्किक दृष्टिकोण और माता के धार्मिक स्वभाव के समन्वय ने नरेंद्र के शुरुआती जीवन और सोच को आकार दिया। बचपन से ही नरेंद्र में आध्यात्मिकता के प्रति गहरा झुकाव था और वे अक्सर शिव, राम, सीता और हनुमान की मूर्तियों के सामने ध्यान लगाया करते थे। नरेंद्र बचपन में अत्यंत नटखट और चंचल थे, जिसके कारण उनकी मां अक्सर कहती थीं कि उन्होंने शिव से एक पुत्र मांगा था, लेकिन उन्होंने एक भूत भेज दिया। नरेंद्रनाथ की प्रारंभिक शिक्षा ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपॉलिटन इंस्टीट्यूशन में हुई, और बाद में प्रेसीडेंसी कॉलेज की प्रवेश परीक्षा में प्रथम श्रेणी अंक प्राप्त करने वाले वे एकमात्र छात्र बने। उन्होंने जनरल असेंबली इंस्टीट्यूशन में पश्चिमी तर्कशास्त्र, पश्चिमी दर्शन और यूरोपीय इतिहास का गहन अध्ययन किया। वे डेविड ह्यूम, इमैनुएल कांट, स्पिनोजा, हीगल, चार्ल्स डार्विन और हरबर्ट स्पेंसर के विचारों से बेहद प्रभावित थे, यहाँ तक कि उन्होंने स्पेंसर की पुस्तक 'एजुकेशन' का बंगाली में अनुवाद भी किया था। उनकी कुशाग्र बुद्धि और विलक्षण स्मृति के कारण कॉलेज के प्राचार्य विलियम हेस्टी ने उन्हें एक ऐसा जीनियस बताया था जिसकी प्रतिभा के स्तर का युवा उन्होंने जर्मन विश्वविद्यालयों के दर्शनशास्त्र के छात्रों में भी नहीं देखा था।

शुरुआती दौर में नरेंद्रनाथ केशव चंद्र सेन के नव विधान और साधारण ब्रह्म समाज से जुड़े, जहाँ के विचारों ने उनके शुरुआती धार्मिक दृष्टिकोण को आकार दिया, जो मूर्तिपूजा और जातिगत भेदभाव के विरोधी थे। दर्शनशास्त्र के अगाध ज्ञान के बावजूद ईश्वर को प्रत्यक्ष जानने की उनकी जिज्ञासा शांत नहीं हुई थी। उन्होंने कई प्रतिष्ठित लोगों से एक ही सवाल पूछा कि क्या उन्होंने ईश्वर को देखा है, लेकिन कोई भी उन्हें संतुष्ट नहीं कर सका। जब उन्होंने ब्रह्म समाज के नेता देवेंद्रनाथ टैगोर से यही सवाल किया, तो टैगोर ने उनके सवाल का जवाब न देकर केवल इतना कहा कि तुम्हारी आँखें एक योगी जैसी हैं। नरेंद्र की यह खोज तब पूरी हुई जब उनकी मुलाकात दक्षिणेश्वर के रहस्यवादी संत रामकृष्ण परमहंसा से हुई। नरेंद्र की रामकृष्ण से पहली मुलाकात १८८१ में हुई थी, जिसका माध्यम उनके प्रोफेसर विलियम हेस्टी बने थे जो कक्षा में वर्डस्वर्थ की कविता समझाते हुए समाधि शब्द का अर्थ समझने के लिए दक्षिणेश्वर जाने का सुझाव दे रहे थे। जब नरेंद्र ने रामकृष्ण से पूछा कि क्या आपने भगवान को देखा है, तो रामकृष्ण ने तुरंत उत्तर दिया कि हाँ, मैं उन्हें उतना ही स्पष्ट देख सकता हूँ जितना तुम्हें देख रहा हूँ, बस बहुत अधिक तीव्रता के साथ। शुरुआत में नरेंद्र ने रामकृष्ण के विचारों का विरोध किया और उनकी समाधि को मतिभ्रम माना, लेकिन रामकृष्ण के अडिग प्रेम और व्यक्तित्व ने उन्हें अंततः अपना समर्पित शिष्य बना लिया। १८८४ में पिता की अचानक मृत्यु ने नरेंद्र के परिवार को दिवालियापन के कगार पर खड़ा कर दिया। कर्जदारों के दबाव और गरीबी के इस भीषण दौर में नरेंद्र ने रामकृष्ण के कहने पर मंदिर जाकर मां काली से सांसारिक सुखों के बजाय सच्चे ज्ञान और भक्ति का वरदान मांगा। १८८५ में रामकृष्ण को गले का कैंसर होने के बाद नरेंद्र और अन्य शिष्यों ने उनकी सेवा की और इसी दौरान नरेंद्र ने निर्विकल्प समाधि का अनुभव किया। रामकृष्ण ने अपने शिष्यों को गेरुआ वस्त्र देकर भारत के पहले रामकृष्ण संन्यासी संघ की नींव रखी और नरेंद्र को उनका नेता नियुक्त किया। १६ अगस्त १८८६ को रामकृष्ण के महाप्रयाण के बाद, नरेंद्र ने बारांनगर में एक जर्जर मकान को पहले रामकृष्ण मठ में परिवर्तित किया, जहाँ सभी शिष्य कठोर ध्यान और साधना में लीन रहते थे।

१८८६ के दिसंबर महीने में अंतपुर गांव में नरेंद्र और आठ अन्य शिष्यों ने औपचारिक रूप से संन्यास की दीक्षा ली। इसके बाद, १८८८ में नरेंद्र ने एक परिव्राजक संन्यासी के रूप में एक कमंडल, लाठी और अपनी दो प्रिय पुस्तकों, भगवद गीता और 'द इमिटेशन ऑफ क्राइस्ट' को लेकर पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की यात्रा शुरू की। पांच वर्षों तक पैदल और रेलवे से यात्रा करते हुए वे विद्वानों, राजाओं, दलितों, हिंदुओं, मुसलमानों और ईसाइयों सभी के संपर्क में आए। इस यात्रा के दौरान उन्होंने ब्रिटिश भारत में आम जनता की घोर गरीबी और कष्टों को अत्यंत निकट से देखा, जिससे उनके भीतर समाज सेवा के माध्यम से राष्ट्र के उत्थान का संकल्प जन्मा। अपने मित्र और शिष्य खेतड़ी के राजा अजीत सिंह के सुझाव पर उन्होंने 'विवेकानंद' नाम धारण किया, जिसका अर्थ है विवेक और आनंद का संगम। इसी नाम के साथ वे ३१ मई १८९३ को मुंबई से शिकागो के लिए रवाना हुए। ११ सितंबर १८९३ को शिकागो के आर्ट इंस्टीट्यूट में आयोजित विश्व धर्म संसद में जब स्वामी विवेकानंद ने मंच पर आकर अपने भाषण की शुरुआत "अमेरिका के भाइयों और बहनों!" के शब्दों से की, तो सात हजार की भीड़ ने खड़े होकर दो मिनट तक तालियों की गड़गड़ाहट से उनका स्वागत किया। उन्होंने वैदिक संन्यासियों की ओर से दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का संदेश दिया और शिव महिम्न स्तोत्र तथा भगवद गीता के श्लोकों को उद्धृत करते हुए स्पष्ट किया कि जिस प्रकार सभी नदियाँ अंततः समुद्र में मिलती हैं, उसी प्रकार सभी धार्मिक मार्ग ईश्वर की ओर ही ले जाते हैं। उनके इस प्रभावशाली भाषण ने अमेरिकी मीडिया को स्तब्ध कर दिया। न्यूयॉर्क हेराल्ड ने उन्हें धर्म संसद की सबसे महान विभूति बताया और लिखा कि ऐसे ज्ञानी राष्ट्र में ईसाई मिशनरियों को भेजना कितनी बड़ी मूर्खता है।

शिकागो की इस अभूतपूर्व सफलता के बाद स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका और यूरोप में व्यापक रूप से व्याख्यान दिए। उन्होंने १८९४ में वेदांत सोसाइटी ऑफ न्यूयोर्क की स्थापना की। पश्चिम के लोगों की समझ के अनुकूल उन्होंने हिंदू दर्शन को 'चार योग' (राजयोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग) के मॉडल में प्रस्तुत किया। १८९६ में प्रकाशित उनकी पुस्तक 'राजयोग' ने पश्चिमी जगत में आधुनिक योग की नींव रखी। अमेरिका प्रवास के दौरान उन्हें सैन जोस के पहाड़ों में वेदांत छात्रों के लिए भूमि उपहार में मिली, जिसे उन्होंने 'शांति आश्रम' का नाम दिया। विदेशों में उनके शिष्यों में मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल (भगिनी निवेदिता) प्रमुख थीं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन भारतीय महिलाओं की शिक्षा और स्वतंत्रता संग्राम के लिए समर्पित कर दिया। पश्चिम से ही विवेकानंद ने भारत के उत्थान के लिए अपने गुरुभाइयों को पत्र लिखकर दरिद्र नारायण की सेवा करने का निर्देश दिया। १६ दिसंबर १८९६ को वे इंग्लैंड से भारत के लिए रवाना हुए और जनवरी १८९७ में कोलंबो पहुंचे, जहाँ उनका भव्य स्वागत हुआ। भारत लौटकर उन्होंने कोलंबो से अल्मोड़ा तक दिए अपने प्रसिद्ध व्याख्यानों में जाति व्यवस्था के उन्मूलन, विज्ञान और औद्योगीकरण को बढ़ावा देने, गरीबी दूर करने और औपनिवेशिक शासन को समाप्त करने का आह्वान किया। १ मई १८९७ को उन्होंने सामाजिक सेवा और मानवीय कार्यों के लिए रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जिसका मुख्यालय बाद में बेलूर मठ बना। १८९३ की यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात उद्योगपति जमशेदजी टाटा से हुई थी, जिन्हें विवेकानंद ने भारत में एक शोध संस्थान स्थापित करने के लिए प्रेरित किया था।

अपने गिरते स्वास्थ्य के बावजूद स्वामी विवेकानंद ने १८९९ में दूसरी बार पश्चिम की यात्रा की और पेरिस में धर्म संसद में भाग लिया। दिसंबर १९०० में भारत लौटने के बाद वे बेलूर मठ में रहने लगे, जहाँ वे अस्थमा, मधुमेह और अनिद्रा जैसी पुरानी बीमारियों से पीड़ित होने के बावजूद लगातार कार्यों का संचालन करते रहे। ४ जुलाई १९०२ को, स्वामी विवेकानंद सुबह जल्दी उठे, बेलूर मठ में तीन घंटे ध्यान किया, शिष्यों को शुक्ल-यजुर्वेद और संस्कृत व्याकरण पढ़ाया और शाम को ७ बजे अपने कमरे में चले गए। रात ९:२० पर ध्यान की मुद्रा में ही उन्होंने महासमाधि ले ली, जिसके बारे में शिष्यों का मानना था कि ब्रह्मरंध्र के फटने से उनका प्राणांत हुआ। स्वामी विवेकानंद ने न केवल वेदांत दर्शन को विश्व पटल पर स्थापित किया, बल्कि भारत में राष्ट्रवाद की एक नई लहर पैदा की। उन्हें आधुनिक भारत का एक देशभक्त संत माना जाता है और उनके इसी राष्ट्र-निर्माण के योगदान के कारण उनके जन्मदिन, १२ जनवरी को भारत में राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। उनका यह संदेश कि "उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए," आज भी वैश्विक चेतना और भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है।

Pratahkal HQ

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