कौन थे सूर्य सेन? चटगांव शस्त्रागार छापे के मास्टरमाइंड और भारतीय क्रांति के 'मास्टर दा' की गौरवगाथा
क्रांतिकारी सूर्य सेन ने 1930 में चटगांव शस्त्रागार पर धावा बोलकर ब्रिटिश शासन को चुनौती दी थी, जिसके बाद उन्हें 1934 में फांसी दी गई।

भारत की आजादी का इतिहास केवल अहिंसक आंदोलनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन जांबाज नायकों के रक्त से भी लिखा गया है जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ों को हिलाकर रख दिया था।
22 मार्च 1894 को बंगाल प्रेसीडेंसी के चटगांव में जन्मे सूर्य कुमार सेन, जिन्हें दुनिया 'मास्टर दा' के नाम से जानती है, भारतीय स्वाधीनता संग्राम के एक ऐसे ही प्रखर और तेजस्वी नक्षत्र थे। एक साधारण शिक्षक से क्रांतिकारी महानायक बनने तक का उनका सफर राष्ट्रवाद और अदम्य साहस की मिसाल है। सूर्य सेन के भीतर देशभक्ति का संचार उनके छात्र जीवन के दौरान ही हो गया था, जब वे बहरामपुर कॉलेज में बीए की पढ़ाई कर रहे थे। वहाँ उन्हें अपने शिक्षक सतीशचंद्र चक्रवर्ती से क्रांतिकारी आदर्शों की प्रेरणा मिली। 1918 में चटगांव लौटने के बाद उन्होंने शिक्षण कार्य शुरू किया, जहाँ अपनी सादगी और व्यक्तित्व के कारण वे 'मास्टर दा' कहलाए। जल्द ही वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की चटगांव शाखा के अध्यक्ष चुने गए और असहयोग आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई। उनका मानना था कि 'मानवता एक क्रांतिकारी का विशेष गुण है', और इसी विचार के साथ उन्होंने युवाओं की एक टोली तैयार की, जिसमें अनंत सिंह, गणेश घोष और लोकेनाथ बल जैसे समर्पित सेनानी शामिल थे।
सूर्य सेन की क्रांतिकारी गतिविधियों का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय 18 अप्रैल 1930 को लिखा गया, जब उन्होंने 'चटगांव शस्त्रागार छापे' का नेतृत्व किया। यह योजना केवल हथियार लूटने तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसका उद्देश्य संचार माध्यमों को ध्वस्त कर चटगांव को ब्रिटिश शासन से पूरी तरह अलग करना था। क्रांतिकारियों ने शस्त्रागार पर तिरंगा फहराया और ब्रिटिश सत्ता को खुली चुनौती दी। हालांकि, इस साहसी अभियान के बाद जलालाबाद की पहाड़ियों पर हुए भीषण संघर्ष में कई क्रांतिकारी शहीद हुए, लेकिन मास्टर दा पीछे नहीं हटे। अगले तीन वर्षों तक वे भेष बदलकर पुलिस की आँखों में धूल झोंकते रहे; कभी किसान, कभी मजदूर तो कभी मौलवी बनकर उन्होंने अपना संघर्ष जारी रखा। दुर्भाग्यवश, अपनों के विश्वासघात के कारण फरवरी 1933 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जेल की कालकोठरी में उन्हें अमानवीय यातनाएं दी गईं, लेकिन भारत मां के इस सपूत ने अंत तक घुटने नहीं टेके। 12 जनवरी 1934 को उन्हें फांसी दे दी गई। अपने अंतिम संदेश में उन्होंने स्वतंत्र भारत के सुनहरे सपने को जीवित रखने का आह्वान किया था, जो आज भी करोड़ों भारतीयों को प्रेरित करता है। उनका बलिदान और 'उलगुलान' का जज्बा उन्हें इतिहास के पन्नों में हमेशा अमर रखेगा।

