लोकनायक माणिक्य लाल वर्मा की ज्येष्ठ पुत्री के रूप में जन्मी स्नेहलता जी के व्यक्तित्व में बचपन से ही देशभक्ति और अदम्य साहस का समावेश था, जो उन्हें उनके पिता की महान विरासत से मिला था। उनका प्रारंभिक जीवन संघर्षों और आंदोलनों की छांव में बीता, जहां उन्होंने न केवल ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध उठती आवाजों को सुना, बल्कि स्वयं भी राजस्थान के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में एक सक्रिय भूमिका निभाई। वह उन चुनिंदा व्यक्तित्वों में से थीं जिन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी अपने जीवन के मिशन को विराम नहीं दिया। उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा समाज के वंचित वर्गों के उत्थान और शिक्षा के प्रसार में समर्पित रहा। उन्होंने भीलवाड़ा और आसपास के क्षेत्रों में सामाजिक चेतना जागृत करने के लिए निरंतर कार्य किया और अपने पिता के आदर्शों को अक्षरशः जीकर दिखाया। 97 वर्षों की एक लंबी और सार्थक जीवन यात्रा को पूर्ण करने वाली स्नेहलता जी अंतिम समय तक अपनी वैचारिक दृढ़ता के लिए जानी जाती रहीं। उनका पूरा सफर उस दौर का गवाह रहा जब भारत अपनी नई पहचान गढ़ रहा था और वे उस निर्माण की एक महत्वपूर्ण शिल्पी थीं। जब उनकी अंतिम यात्रा बापू नगर स्थित निवास से जवाहर नगर मोक्षधाम के लिए निकली, तो वह केवल एक पार्थिव देह की विदाई नहीं थी, बल्कि एक युग का प्रस्थान था। भीलवाड़ा के राजकीय सम्मान के साथ जब उन्हें अंतिम विदाई दी गई और अतिरिक्त कलेक्टर द्वारा पुष्पचक्र अर्पित कर सलामी दी गई, तो वह उनके दशकों के त्याग और निष्ठा के प्रति राष्ट्र की कृतज्ञता का प्रतीक था। उनका जाना राजस्थान की राजनीति और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में एक ऐसी रिक्तता छोड़ गया है जिसे भरना कठिन है, लेकिन उनकी संघर्षशीलता और निस्वार्थ सेवा की विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव मार्गदर्शक का कार्य करेगी।

स्नेहलता वर्मा का इतिहास और उनके जीवन के सिद्धांत आज भी यह याद दिलाते हैं कि स्वतंत्रता केवल एक राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज के प्रति निरंतर उत्तरदायित्व का नाम है। उनका व्यक्तित्व आने वाले समय में भी राजस्थान के गौरवशाली इतिहास में एक अमिट अध्याय की तरह चमकता रहेगा, जो हमें सिखाता है कि किस प्रकार एक निस्वार्थ जीवन समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित किया जाता है।

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