कौन थे सिद्धचार्य जसनाथजी? चमत्कारी सिद्ध संत और धधकते अंगारों पर नृत्य की अनूठी परंपरा के प्रणेता
जसनाथी संप्रदाय के प्रवर्तक श्री जसनाथ जी के जीवन, 36 नियमों की स्थापना और बीकानेर के कतरियासर में उनके आध्यात्मिक योगदान का विस्तृत विवरण।

बीकानेर की पावन धरा पर कतरियासर ग्राम में अवतरित हुए सिद्धाचार्य श्री जसनाथ जी महाराज मध्यकालीन भारत के उन महान संतों में शुमार हैं, जिन्होंने अपनी आध्यात्मिक शक्ति और सामाजिक सुधारों से मरुभूमि की संस्कृति को एक नई दिशा प्रदान की। विक्रम संवत 1561 में रामूजी सारण को छत्तीस धार्मिक नियमों की दीक्षा देकर जसनाथी संप्रदाय की नींव रखने वाले इस महान संत का प्राकट्य किसी दैवीय चमत्कार से कम नहीं माना जाता। कहा जाता है कि कतरियासर के शासक हमीरजी की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं परमात्मा ने कार्तिक सुदी एकादशी यानी देवउठनी ग्यारस के ब्रह्म मुहूर्त में डाभला तालाब के किनारे एक बालक के रूप में दर्शन दिए थे। जसनाथ जी का बचपन विस्मयकारी घटनाओं से भरा रहा, जिसमें सबसे प्रमुख प्रसंग उनके धधकते अंगारों के बीच बैठने का है। जब उनकी माता रूपादे ने उन्हें जलते चूल्हे में खेलते देखा और घबराकर बाहर निकाला, तो बालक के शरीर पर जलने का एक भी निशान न पाकर वे अवाक रह गईं। अग्नि पर विजय की यही सिद्ध शक्ति आज भी जसनाथी संप्रदाय के 'अग्नि नृत्य' में जीवित है, जहाँ सिद्ध साधक धधकते अंगारों पर नाचते हुए अपनी अडिग आस्था का प्रदर्शन करते हैं। जसनाथ जी का जीवन श्रीमद्भगवद्गीता के उन उपदेशों की जीवंत व्याख्या जान पड़ता है, जहाँ पूर्ण ब्रह्म की प्राप्ति के लिए तत्वदर्शी संत से ज्ञान लेने की महत्ता बताई गई है। युवावस्था में उनका विवाह नेपालजी की पुत्री कालादे जी से तय हुआ, जिन्हें सती और भगवती का स्वरूप माना जाता है। मात्र 24 वर्ष की अल्पायु में ही जीवित समाधि लेकर उन्होंने संसार को नश्वरता और आध्यात्मिक अमरता का संदेश दिया। उनके समाधि काल के समय उन्होंने अपने शिष्य हरोजी को धर्मपीठ की स्थापना और संप्रदाय के प्रचार का उत्तरदायित्व सौंपा। आज कतरियासर स्थित उनका मुख्य मंदिर न केवल एक तीर्थ स्थल है, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत केंद्र भी है, जिसे भविष्य के लिए सुरक्षित रखने हेतु हाल ही में राजस्थान सरकार द्वारा एक भव्य पैनोरमा के निर्माण की घोषणा की गई है। सिद्धाचार्य जसनाथ जी का जीवन त्याग, तपस्या और मानवता के कल्याण का एक ऐसा अध्याय है, जो सदियों बाद भी समाज को नैतिकता और संयम के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता रहेगा।

