कौन थे शिवराम हरि राजगुरु? भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के वह अमर सेनानी जिन्होंने राष्ट्रवेदी पर हँसते-हँसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
संस्कृत विद्वान से क्रांतिकारी बने राजगुरु ने भगत सिंह और सुखदेव के साथ सॉन्डर्स वध में मुख्य भूमिका निभाई और देश के लिए शहादत दी।

भारतीय स्वाधीनता के रक्तरंजित इतिहास में शिवराम हरि राजगुरु का नाम एक ऐसे प्रखर सूर्य के समान है, जिसकी तपिश ने ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें हिला दी थीं। पुणे जिले के खेड़ा गाँव में भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी, संवत 1965 तदनुसार वर्ष 1908 में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे राजगुरु का शुरुआती जीवन संघर्षों की अग्नि में तपा, जहाँ मात्र छह वर्ष की अल्पायु में पिता का साया सिर से उठ जाने के बाद वे विद्याध्ययन के लिए वाराणसी चले आए। काशी की तपोभूमि पर उन्होंने न केवल संस्कृत, वेदों और हिंदू शास्त्रों का गहन अध्ययन किया, बल्कि लघु सिद्धांत कौमुदी जैसे जटिल ग्रंथों को कंठस्थ कर अपनी विलक्षण मेधा का परिचय दिया। बचपन से ही कसरत और शारीरिक सौष्ठव के शौकीन राजगुरु छत्रपति शिवाजी महाराज की छापामार युद्ध शैली के अनन्य प्रशंसक थे, और यही अटूट साहस उन्हें वाराणसी के क्रांतिकारी गलियारों तक ले गया। वहाँ उनकी भेंट चंद्रशेखर आजाद से हुई, जिनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर वे तत्काल 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी' में सम्मिलित हो गए, जहाँ उन्हें 'रघुनाथ' के छद्म नाम से जाना जाता था। एक अचूक निशानेबाज के रूप में विख्यात राजगुरु ने पंडित चंद्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह और यतींद्रनाथ दास जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर स्वाधीनता की अलख जगाई। लाला लाजपत राय की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए जब सॉन्डर्स के वध की योजना बनी, तब राजगुरु ने भगत सिंह और सुखदेव के कंधे से कंधा मिलाकर इस साहसिक कार्य को अंजाम दिया, जबकि आजाद ने उनकी सुरक्षा की कमान संभाली। नियति ने इस वीर को अमरता की ओर मोड़ा और 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में भगत सिंह और सुखदेव के साथ फांसी के फंदे को चूमते हुए उन्होंने भारतीय इतिहास के पन्नों में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित कर दिया। राजगुरु का यह सर्वोच्च बलिदान आज भी राष्ट्रभक्ति की सर्वोच्च पराकाष्ठा माना जाता है, जो आने वाली पीढ़ियों को निस्वार्थ राष्ट्रसेवा और अदम्य साहस की प्रेरणा देता रहेगा।

