4 नवंबर 1929 को बेंगलुरु के एक कन्नड़ ब्राह्मण परिवार में जन्मी शकुंतला देवी की जीवन यात्रा किसी चमत्कार से कम नहीं थी। उनके पिता सी. वी. सुंदरराजा राव सर्कस में एक कलाकार थे, जिन्होंने तब अपनी तीन साल की बेटी की विलक्षण प्रतिभा को पहचाना जब वे उसे ताश का एक खेल सिखा रहे थे। बिना किसी औपचारिक स्कूली शिक्षा के, शकुंतला देवी ने महज छह साल की उम्र में मैसूर विश्वविद्यालय में अपनी अंकगणितीय क्षमताओं का प्रदर्शन कर सबको हैरान कर दिया। पिता ने उनकी इस अनोखी प्रतिभा को देखते हुए सर्कस छोड़ दिया और उनके साथ रोड शो करने लगे, जिसने उन्हें बचपन में ही प्रसिद्धि की राह पर खड़ा कर दिया। 1944 में वह लंदन चली गईं, जहाँ से उनकी प्रतिभा का डंका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बजना शुरू हुआ।

शकुंतला देवी की गणना करने की गति इतनी तीव्र थी कि 1977 में अमेरिका की सदर्न मेथोडिस्ट यूनिवर्सिटी में उन्होंने 201 अंकों वाली एक संख्या का 23वां मूल मात्र 50 सेकंड में निकाल लिया था। इस उत्तर की पुष्टि के लिए विशेष रूप से प्रोग्राम किए गए UNIVAC 1101 कंप्यूटर को भी 62 सेकंड का समय लगा था, यानी शकुंतला देवी ने मशीन को भी 12 सेकंड से मात दे दी थी। उनके जीवन का सबसे ऐतिहासिक क्षण 18 जून 1980 को आया, जब लंदन के इंपीरियल कॉलेज में उन्होंने 13 अंकों वाली दो रैंडम संख्याओं का गुणनफल महज 28 सेकंड में बता दिया। इस अद्भुत उपलब्धि ने उन्हें 1982 के 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' में जगह दिलाई, जिसका प्रमाण पत्र हालांकि उन्हें मरणोपरांत 2020 में प्रदान किया गया।

गणित के अलावा शकुंतला देवी का व्यक्तित्व बहुआयामी था। उन्होंने न केवल गणना की विधियों को सरल बनाने के लिए 'फिगरिंग: द जॉय ऑफ नंबर्स' जैसी पुस्तकें लिखीं, बल्कि ज्योतिष, उपन्यास और कुकबुक में भी अपनी लेखनी का जादू बिखेरा। 1977 में उन्होंने 'द वर्ल्ड ऑफ होमोसेक्सुअल्स' लिखकर भारतीय समाज में एक साहसी कदम उठाया, जिसे भारत में समलैंगिकता पर पहला अकादमिक अध्ययन माना जाता है। उन्होंने इस विषय पर सहानुभूति के बजाय पूर्ण स्वीकृति की वकालत की, जो उस दौर के हिसाब से बेहद प्रगतिशील विचार था। उनका निजी जीवन भी चर्चाओं में रहा; उन्होंने आईएएस अधिकारी परितोष बनर्जी से विवाह किया, जिनसे बाद में उनका तलाक हो गया। उन्होंने राजनीति में भी हाथ आजमाया और 1980 के लोकसभा चुनाव में दक्षिण मुंबई और मेडक से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा।

शकुंतला देवी का मानना था कि गणित कोई बोझ नहीं बल्कि एक आनंद है और उन्होंने 'मैथेबिलिटी' जैसी पुस्तकों के माध्यम से बच्चों में गणित के प्रति प्रेम जगाने का निरंतर प्रयास किया। 21 अप्रैल 2013 को 83 वर्ष की आयु में बेंगलुरु के एक अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनकी विरासत आज भी उन लाखों विद्यार्थियों और गणित प्रेमियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है जो अंकों के रहस्य को समझना चाहते हैं। मरणोपरांत उनके जीवन पर आधारित फिल्म और गूगल डूडल के माध्यम से मिली श्रद्धांजलि इस बात का प्रमाण है कि वह न केवल एक गणितीय जादूगरनी थीं, बल्कि एक ऐसी भारतीय महिला थीं जिन्होंने अपनी मेधा के दम पर वैश्विक पटल पर भारत का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित किया।

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