कौन थे संत रविदास? ...मध्यकालीन भारत के वह महान समाज सुधारक और संत-कवि जिन्होंने रूढ़ियों को तोड़कर मानवता को भक्ति और समरसता का मार्ग दिखाया!
भक्ति आंदोलन के महान संत और समाज सुधारक रैदास का जीवन सफर, मीराबाई से उनका संबंध और समतावादी समाज के लिए दिया गया 'बेगमपुरा' का संदेश।

मध्यकालीन भारत के सांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास में भक्ति आंदोलन के दौरान एक ऐसी अलख जगी, जिसने समाज के ताने-बाने को हमेशा के लिए बदल दिया। इस युगांतरकारी आंदोलन के सबसे प्रखर और दैदीप्यमान नक्षत्रों में से एक थे संत रविदास, जिन्हें जनमानस में आदरपूर्वक 'रैदास' भी कहा जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पंजाब और हरियाणा जैसे विस्तृत भू-भाग में एक परम गुरु और आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में पूजे जाने वाले संत रविदास महज एक कवि नहीं, बल्कि एक महान समाज सुधारक और मानवीय गरिमा के रक्षक थे। उनके जीवन काल को लेकर इतिहासकारों और विद्वानों में गहरे मतभेद रहे हैं, क्योंकि चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दी के ऐतिहासिक दस्तावेज़ बेहद सीमित हैं। कुछ विद्वान उनका जन्म सन 1377 ईस्वी और देहावसान 1528 ईस्वी में बनारस में मानते हैं, जिसके अनुसार उनकी आयु 151 वर्ष बैठती है, जबकि अमरेश दत्त जैसे विद्वान उनके जीवनकाल को सन 1267 से 1335 ईस्वी के बीच का बताते हैं। वहीं कुछ अन्य शोधकर्ता उनका जन्म सन 1433 ईस्वी में स्वीकार करते हैं। इस कालावधि की एक सबसे महत्वपूर्ण और प्रामाणिक कड़ी राजपूत राजकुमारी और प्रसिद्ध भक्ति कवयित्री मीराबाई से जुड़ती है। विभिन्न ऐतिहासिक और साहित्यिक परंपराओं के अनुसार मीराबाई, संत रविदास की परम शिष्या थीं और उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है कि संत रविदास से ही उन्हें आध्यात्मिक दीक्षा मिली थी। मीराबाई का जीवनकाल सन 1498 से 1547 ईस्वी के मध्य था और उनके वयस्क होने तथा सन 1516 के आसपास हुए विवाह के समय संत रविदास जीवित थे और उनका मार्गदर्शन कर रहे थे, जिससे यह अकाट्य रूप से सिद्ध होता है कि उनका जीवनकाल पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और सोलहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध के बीच रहा होगा।
विविधताओं से भरे भारत देश में इस महान संत को अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय उच्चारणों और अगाध श्रद्धा के कारण भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा गया। जहाँ हिंदी भाषी क्षेत्रों में 'रविदास' और उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व बिहार में 'रैदास' नाम सर्वाधिक प्रचलित हुआ, वहीं बंगाल और पूर्वी भारत में उन्हें 'रुहीदास' या 'रुईदास' तथा महाराष्ट्र, कर्नाटक व गुजरात में 'रोहिदास' नाम से जाना गया। पश्चिम पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए अनुयायियों ने उन्हें 'रामदास' भी कहा, जो मूलतः 'रविदासिया' शब्द का ही एक बदला हुआ रूप है। पंजाब के पुआध और मालवा क्षेत्रों में 'रामदासिया' तथा दोआबा क्षेत्र में 'रविदासिया' शब्द का विशेष क्षेत्रीय संदर्भों में प्रयोग होता रहा है। वर्तमान में वैश्विक स्तर पर उनके अनुयायियों को 'रविदासिया' के नाम से जाना जाता है, जबकि पंजाब के सिख चमार अनुयायी 'रामदासिया' और राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र व कर्नाटक के श्रद्धालु उन्हें 'रोहिदासी' कहते हैं, वहीं मॉरीशस में उनके भक्तों को 'रवि वेद' कहा जाता है।
संत रविदास का जन्म वर्तमान उत्तर प्रदेश में वाराणसी के समीप स्थित सीर गोवर्धनपुर गाँव में हुआ था, जिसे आज 'श्री गुरु रविदास जन्म स्थान' के रूप में जाना जाता है और जहाँ बना भव्य मंदिर उनके अनुयायियों की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है। उनके पिता का नाम संतोख दास और माता का नाम काल्सी देवी था। वे चर्मकार (चमार) समुदाय से संबंध रखते थे, जिसे उस दौर के रूढ़िवादी समाज में एक अछूत जाति माना जाता था। जन्म से मिले इस सामाजिक दंश के बावजूद उन्होंने कभी अपनी पहचान नहीं छुपाई। उनका मूल पारिवारिक व्यवसाय चमड़े का काम करना था, परंतु उनका मन बहुत जल्द ही गंगा के घाटों पर आध्यात्मिक खोज में लग गया और वे सूफी संतों, साधुओं तथा तपस्वियों की संगति में रहने लगे। मात्र बारह वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह लोना देवी से कर दिया गया और कालान्तर में उनके घर विजय दास नाम के पुत्र का जन्म हुआ। मध्यकालीन जीवनी ग्रंथों में अनंतदास की 'परचई' और सत्रहवीं शताब्दी में नाभादास द्वारा रचित 'भक्तमाल' संत रविदास के जीवन की सबसे शुरुआती और प्रामाणिक झांकी प्रस्तुत करते हैं। 'भक्तमाल' और 'रत्नावली' जैसे ग्रंथों के अनुसार, वे ब्राह्मण भक्ति-कवि स्वामी रामानंद के शिष्य थे और उन्हें कबीर का समकालीन माना जाता है। उन्होंने अपने जीवनकाल में देश के सुदूर क्षेत्रों जैसे आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और हिमालय के तीर्थस्थलों की व्यापक यात्राएं कीं। इन यात्राओं और अपने अनुभवों के बाद उन्होंने ईश्वर के सगुण (मूर्ति और रूप वाले) रूप को छोड़कर पूरी तरह से निर्गुण (अमूर्त और निराकार) रूप को अपना लिया। उनकी इस अद्भुत वैचारिक और आध्यात्मिक ऊंचाई का ही प्रभाव था कि तत्कालीन समाज के उच्च वर्ग और ब्राह्मण भी उनके ज्ञान के आगे नतमस्तक होते थे।
संत रविदास की शिक्षाओं और विचारों का सबसे प्राचीन व प्रामाणिक स्रोत सिखों के पवित्र ग्रंथ 'गुरु ग्रंथ साहिब' में मिलता है, जिसमें उनके 41 पावन पदों (कविताओं) को सहेजकर शामिल किया गया है, जहाँ मुख्यधारा के सिख उन्हें एक महान 'भगत' के रूप में पूजते हैं। इसके अतिरिक्त हिंदू दादूपंथी परंपरा के 'पंच वाणी' पाठ में भी उनकी कविताओं का एक बड़ा संग्रह मौजूद है। सन 1693 में रचित सिख परंपरा के ग्रंथ 'प्रेमबोध' में उन्हें भारतीय धार्मिक परंपरा के सत्रह महान संतों में स्थान दिया गया। अनंतदास की 'परचई' की विभिन्न प्राचीन पांडुलिपियों के विश्लेषण से पता चलता है कि समय के साथ मूल पाठ में कई तरह के जातिगत और उत्पीड़न संबंधी बदलाव करने की कोशिशें भी की गईं, लेकिन सन 1676 की प्रामाणिक प्रति उनके वास्तविक विचारों को कबीर और सेन के समान ही दर्शाती है। संत रविदास के दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता थी कि उन्होंने ईश्वर के प्रति अगाध प्रेम और भक्ति को सर्वोपरि माना। उनकी कविताओं में हिंदू नाथ योग दर्शन के तत्व और 'सहज' की स्थिति का बार-बार उल्लेख मिलता है, जो जीव और ब्रह्म के एक हो जाने की परम अवस्था है। उन्होंने तत्कालीन समाज में फैले जातिगत भेदभाव, छुआछूत, धार्मिक आडंबरों और कर्मकांडों का पुरजोर खंडन किया। 'गुरु ग्रंथ साहिब' में संकलित उनके पदों में वे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि वेदों और पुराणों को सुनने के बाद भी यदि मन का संशय और अहंकार दूर नहीं हुआ, तो वह ज्ञान व्यर्थ है। बाहरी जल से शरीर धोने और भीतर विकारों को पाले रखने की क्रिया को उन्होंने 'गज स्नान' (हाथी के नहाने) की उपमा दी, जो नहाने के तुरंत बाद अपने ऊपर धूल उड़ा लेता है। उन्होंने एक ऐसे आदर्श राज्य 'बेगमपुरा' (बिना गम का शहर) की अनूठी परिकल्पना की, जहाँ कोई भी नागरिक द्वितीय या तृतीय श्रेणी का न हो, जहाँ न कोई दुख हो, न भय और न ही कोई गैर-बराबरी हो।
संत रविदास का ऐतिहासिक प्रभाव और विरासत आज सदियों बाद भी उतनी ही जीवंत है। इक्कीसवीं सदी में उनके विचारों को मानने वाले अनुयायियों ने 'रविदासिया धर्म' के रूप में एक स्वतंत्र धार्मिक पहचान स्थापित की, विशेष रूप से सन 2009 में वियना के एक मंदिर में हुए हिंसक हमले और संत रामानंद दास की मृत्यु के बाद इस समुदाय ने स्वयं को सिख धर्म से अलग घोषित कर दिया और 'अमृतवाणी श्री गुरु रविदास जी' नाम से अपना एक पवित्र ग्रंथ संकलित किया जिसमें उनके 240 भजन शामिल हैं। सीर गोवर्धनपुर स्थित उनका जन्मस्थान आज एक विशाल आध्यात्मिक और सामाजिक केंद्र बन चुका है, जहाँ प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को उनकी जयंती पर लाखों श्रद्धालु जुटते हैं। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में मीराबाई के मंदिर के सामने बनी एक छोटी छतरी में आज भी संत रविदास के चरण चिह्न अंकित हैं, जो सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ती एक राजपूत राजकुमारी और एक दलित संत के अटूट गुरु-शिष्य संबंध की मूक गवाह है। भारतीय राजनीति और वैश्विक स्तर पर भी उनका प्रभाव अद्भुत है; भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री उनके मंदिर में शीश नवाने आते रहे हैं, यहाँ तक कि चुनाव आयोग को भी उनकी जयंती के महत्व के कारण पंजाब विधानसभा चुनाव टालने पड़े थे। भारत के बाहर भी ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा और यूरोप में बने उनके भव्य मंदिर न केवल प्रार्थना स्थल हैं बल्कि सामाजिक समरसता और पहचान के वैश्विक प्रतीक हैं, जहाँ कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो जैसे अंतरराष्ट्रीय नेता भी आकर उनके द्वारा प्रतिपादित समानता के सिद्धांतों की सराहना कर चुके हैं। वास्तव में, संत रविदास का जीवन और उनकी वाणी मध्यकालीन अंधकार को चीरकर निकली मानवता की वह शाश्वत किरण है, जो आज भी हर प्रकार के भेदभाव को मिटाकर एक समतावादी और करुणामय समाज के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करती है।

