कौन थे संत निवृत्तिनाथ? जानिए ज्ञानेश्वर के गुरु और वारकरी संप्रदाय के इस महान आधारस्तंभ की गाथा
तेरहवीं शताब्दी के महान योगी विट्ठलपंत कुलकर्णी के पुत्र निवृत्तिनाथ ने सामाजिक बहिष्कार झेलने के बाद भाई ज्ञानेश्वर को दीक्षा देकर अमृतानुभव ग्रंथ की रचना कराई।

तेरहवीं शताब्दी के आध्यात्मिक इतिहास में एक ऐसे मार्गदर्शक का नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज है, जिन्होंने न केवल अपने परिवार को घोर सामाजिक संकट से उबारा बल्कि संपूर्ण समाज को भक्ति और ज्ञान का एक नया मार्ग भी दिखाया।
महाराष्ट्र में पैठण के निकट गोदावरी नदी के तट पर बसे आपेगांव में यादव राजा रामदेवराव के शासनकाल के दौरान देशस्थ ब्राह्मण परिवार में जन्मे निवृत्ति विट्ठलपंत कुलकर्णी (11 फरवरी 1273 - 24 जून 1297) वैष्णव नाथ परंपरा के एक महान संत, कवि, दार्शनिक और योगी थे। वे कुलकर्णी विट्ठलपंत और रखुमाबाई की चार संतानों में सबसे बड़े पुत्र थे। उनके पिता विट्ठलपंत ने पूर्व में संन्यास ग्रहण कर लिया था, परंतु बाद में वे पुनः गृहस्थ जीवन में लौट आए, जिसे तत्कालीन रूढ़िवादी ब्राह्मण समाज ने धर्मविरुद्ध माना। इस कारण समाज ने उनके पूरे परिवार का बहिष्कार कर दिया और उनके बच्चों को समाज में रहने के बुनियादी अधिकारों से भी वंचित कर दिया। समाज में अपने बच्चों की स्वीकृति के लिए विट्ठलपंत और उनकी पत्नी ने कड़ा प्रायश्चित करने का निर्णय लिया और अपने बच्चों को पीछे छोड़कर इंद्रायणी नदी में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए। माता-पिता के इस अप्रत्याशित महाप्रयाण के बाद, निवृत्तिनाथ के कंधों पर अपने छोटे भाई-बहनों की देखरेख और पालन-पोषण का भारी उत्तरदायित्व आ गया।
इस कठिन संघर्ष के बीच, जब निवृत्तिनाथ की आयु लगभग दस वर्ष थी, उनका परिवार नासिक गया हुआ था। एक तीर्थयात्रा के दौरान विट्ठलपंत और उनके परिवार का सामना एक बाघ से हुआ, जिससे बचकर भागने के क्रम में निवृत्तिनाथ अपने परिवार से बिछड़ गए। वे अपनी जान बचाने के लिए अंजनी पर्वत पर स्थित एक गुफा में छिप गए, जहां उनकी मुलाकात महान संत गहिनीनाथ से हुई। गहिनीनाथ ने निवृत्तिनाथ की अंतर्निहित आध्यात्मिक चेतना को पहचाना और उन्हें नाथ परंपरा के गूढ़ ज्ञान और दीक्षा से अनुग्रहीत किया। माता-पिता के अवसान के बाद, नाथ परंपरा के इसी दीक्षा-अनुक्रम और गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वहन करते हुए निवृत्तिनाथ ने अपने छोटे भाई ज्ञानेश्वर को नाथ परंपरा में दीक्षित किया और उनके आध्यात्मिक गुरु बने। एक रचनात्मक कवि और उच्च कोटि के दार्शनिक होने के नाते, निवृत्तिनाथ ने ही ज्ञानेश्वर की अद्वितीय प्रतिभा को दिशा दी। उन्होंने आम जनता की सहूलियत के लिए ज्ञानेश्वर को संस्कृत में रचित पवित्र भगवद्गीता का मराठी भाषा में अनुवाद करने की प्रेरणा दी, ताकि ज्ञान जन-जन तक सुलभ हो सके। उन्होंने अपनी संपूर्ण आध्यात्मिक पूंजी और उपलब्धियां ज्ञानेश्वर को सौंप दीं। इतना ही नहीं, निवृत्तिनाथ के परामर्श और मार्गदर्शन के कारण ही ज्ञानेश्वर ने एक स्वतंत्र दार्शनिक ग्रंथ की रचना की, जिसे आज संसार 'अमृतानुभव' के नाम से जानता है।
ज्ञानेश्वर के समाधि लेने के पश्चात, निवृत्तिनाथ अपनी बहन मुक्ताबाई के साथ तीर्थयात्रा पर निकल पड़े, परंतु यात्रा के दौरान आए एक भयंकर चक्रवाती तूफान में मुक्ताबाई उनसे हमेशा के लिए बिछड़ गईं। इस गहरे वियोग के बाद निवृत्तिनाथ ने भी समाधि ले ली। उनका समाधि स्थल त्र्यंबकेश्वर के निकट स्थित है, जहां आज एक भव्य मंदिर स्थापित है और प्रतिवर्ष भारी संख्या में श्रद्धालु उनके दर्शन और स्मरण के लिए वहां पहुंचते हैं। संत निवृत्तिनाथ का जीवन केवल व्यक्तिगत संघर्षों की कहानी नहीं है, बल्कि वह एक ऐसा कालजयी अध्याय है जिसने विपरीत परिस्थितियों में भी भक्ति आंदोलन की नींव को सुदृढ़ किया और संत ज्ञानेश्वर जैसे महान दार्शनिक को गढ़कर समाज को एक अमर वैचारिक विरासत प्रदान की।

