कौन थे संत नरहरि सोनार? जानिए शिव और विट्ठल की एकात्मता को सिद्ध करने वाले वारकरी संत का संपूर्ण जीवन सफर
शिव और विट्ठल की एकात्मता को सिद्ध करने वाले महाराष्ट्र के प्राचीन स्वर्णकार संत नरहरि महाराज का जीवन सफर, इतिहास और उनके प्रसिद्ध अभंगों का महत्व।

महाराष्ट्र की पावन धरती पर समय-समय पर ऐसे महान संतों का प्रादुर्भाव हुआ है, जिन्होंने अपनी भक्ति और दर्शन से समाज को एक नई दिशा दी। इसी गौरवशाली संत परंपरा में वारकरी संप्रदाय के अत्यंत प्राचीन और आदरणीय संत के रूप में संत नरहरि सोनार का नाम अग्रणीय है, जिनका जन्म श्रावण शुक्ल त्रयोदशी को अनुराधा नक्षत्र में बुधवार के दिन पंढरपुर में हुआ था। मूल रूप से सांगली जिले के मीरज रियासत के म्हेत्रे गांव के निवासी इस परिवार का उपनाम महामुनी था, जो अपनी विद्वता और आध्यात्मिक श्रेष्ठता के कारण 'नाइक' और 'पोतदार' जैसी उपाधियों से भी विभूषित था। नरहरि महाराज के पूर्वजों का इतिहास देवगिरी के यादव राजाओं के काल से जुड़ा है, जहाँ उनके पूर्वजों ने 'नाइक' का प्रतिष्ठित पद प्राप्त किया था। इतिहास के पन्नों में उल्लेख मिलता है कि उनके वंशज पैठन से पंढरपुर आए थे और उनके एक पूर्वज रामचंद्र सदाशिव सोनार ने पंढरपुर को लुटेरों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। संत नरहरि सोनार का पूरा परिवार पारंपरिक रूप से वैष्णव था, जिसका प्रमाण उनके पूर्वजों और वंशजों के नामों से मिलता है; उनके परदादा मुकुंदराज, दादा मुरारी, पिता अच्युतराव और स्वयं नरहरि महाराज के पुत्र नारायण के नामों में सर्वत्र विष्णु के ही रूप समाहित हैं। इसके बावजूद, नरहरि महाराज ने अपने जीवन के शुरुआती वर्षों में कट्टर शैव दीक्षा ली और लगभग चार-पांच वर्षों तक पूरी तरह से भगवान शिव की अनन्य उपासना में लीन रहे। उनका दृढ़ निश्चय इतना कठोर था कि विवाह के बाद पुत्र प्राप्ति न होने के कारण उन्होंने पंढरपुर में रहते हुए भी भगवान विट्ठल का मुख न देखने की कसम खा रखी थी।
संत नरहरि सोनार पेशे से एक कुशल स्वर्णकार थे और पंढरपुर के महाद्वार पर स्थित अपनी दुकान से अपने अद्भुत शिल्प कौशल के लिए पूरे क्षेत्र में विख्यात थे। उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ और वैचारिक रूपांतरण एक अनोखी घटना के साथ हुआ, जब पंढरपुर के एक विट्ठल भक्त साहूकार ने भगवान विट्ठल की मूर्ति के लिए सोने की करधनी (कमरबंद) बनाने का काम उन्हें सौंपा। नरहरि महाराज ने अपनी कसम के कारण मंदिर जाने से मना कर दिया और साहूकार द्वारा दिए गए सटीक माप के आधार पर दुकान में ही एक सुंदर करधनी तैयार की। जब वह करधनी मूर्ति को पहनाई गई, तो वह एक बीता बड़ी हो गई। जब उसे ठीक करने के लिए वापस लाया गया, तो नरहरि महाराज ने दोबारा नाप लेकर उसे छोटा किया, लेकिन इस बार मूर्ति पर पहनाने पर वह छोटी पड़ गई। इस रहस्यमयी विसंगति को सुलझाने के लिए जब वे स्वयं मंदिर गए, तो उन्होंने अपनी आँखों पर पट्टी बांध ली ताकि वे विट्ठल का चेहरा न देख सकें। लेकिन जैसे ही उन्होंने विट्ठल की मूर्ति की कमर पर हाथ लगाया, उन्हें महसूस हुआ कि वे शेर की खाल को छू रहे हैं, और जब उनके हाथ गले तक गए, तो उन्हें वहाँ लिपटे हुए नाग का आभास हुआ। घबराकर जब उन्होंने आँखों की पट्टी हटाई, तो सामने सौम्य विट्ठल की मूर्ति खड़ी थी। जब उन्होंने दोबारा आँखें बंद कर प्रयास किया, तो फिर से उन्हें भगवान शिव के प्रतीकों का अनुभव हुआ। इसी अलौकिक क्षण में ईश्वर ने उन्हें दर्शन देकर यह आत्मज्ञान कराया कि हरि और हर, यानी विष्णु और शिव में कोई भेद नहीं है; दोनों एक ही परम सत्ता के दो रूप हैं। इस दिव्य बोध के बाद संत नरहरि महाराज का अज्ञान नष्ट हो गया, वे पूर्णतः विट्ठल भक्ति में डूब गए और आगे चलकर उन्होंने अपने पुत्र का नाम भी नारायण रखा।
अपने इस परम अनुभव के बाद उन्होंने स्वयं को ईश्वर का स्वर्णकार घोषित करते हुए अनेक कालजयी अभंगों की रचना की, जिनमें "देवा तुझा मी सोनार, तुझे नामाचा व्यवहार" (हे ईश्वर, मैं आपका सुनार हूँ और आपके नाम का ही व्यापार करता हूँ) अत्यंत प्रसिद्ध है। उन्होंने अपनी कला को ही अध्यात्म का माध्यम बनाया, जहाँ वे त्रिगुणों को पिघलाकर ब्रह्मरस की ढलाई करते थे और विवेक के हथौड़े से काम-क्रोध का दमन करते थे। संत नरहरि सोनार ने ९२ वर्ष की लंबी आयु प्राप्त की और वे संत ज्ञानेश्वर, संत निवृत्तिनाथ, संत चोखामेला और संत नामदेव जैसे महान संतों के समकालीन थे। जब माघ कृष्ण तृतीया (या माघ वद्य तृतीया) के दिन पंढरपुर के मल्लिकार्जुन मंदिर के समीप महाद्वार पर उन्होंने समाधि ली, तब संत ज्ञानेश्वर मात्र १२ वर्ष के और संत नामदेव ४२ वर्ष के थे। उनकी समाधि के समय सभी महान संत उपस्थित थे और संत नामदेव महाराज ने स्वयं उनकी आरती और समाधि के प्रसंगों को अपने अभंगों में दर्ज किया। आज भी संपूर्ण भारत में स्वर्णकार समाज और वारकरी संप्रदाय द्वारा उनकी पुण्यतिथि को 'हरियाक्य दिन' के रूप में बेहद श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है, जो हमें यह शाश्वत संदेश देता है कि ईश्वर की सच्ची भक्ति जाति, व्यवसाय और संप्रदायों के संकीर्ण भेदों से परे है।

