कौन थे संत एकनाथ? जानिए समाज सुधारक और मराठी साहित्य के युगपुरुष की महागाथा।
पैठन में जन्मे संत एकनाथ ने छूआछूत के खिलाफ संघर्ष किया और विपरीत परिस्थितियों में भावार्थ रामायण सहित कई कालजयी मराठी ग्रंथों की रचना कर जन-जागरण किया।

भारतीय इतिहास और संत परंपरा में एक ऐसा नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है, जिसने न केवल अध्यात्म की गहराई को आम जनमानस तक पहुँचाया बल्कि समाज में समानता की एक नई अलख भी जगाई। पैठन की पवित्र भूमि पर वर्ष 1533 में संत भानुदास के कुल में जन्मे बालक एकनाथ का प्रारंभिक जीवन बेहद चुनौतीपूर्ण रहा। उनके पिता सूर्यनारायण और माता रुक्मिणी का साया उनके सिर से बचपन में ही उठ गया था, जिसका कारण ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार उनका गोस्वामी तुलसीदास की तरह मूल नक्षत्र में पैदा होना माना जाता था। माता-पिता के असमय निधन के बाद उनका लालन-पालन उनके दादा चक्रपाणि ने किया, जिनके पिता संत भानुदास स्वयं विट्ठल के परम भक्त थे। बचपन से ही तीक्ष्ण बुद्धि और धार्मिक प्रवृत्ति के धनी एकनाथ का मन सांसारिक आकर्षणों से परे ईश्वर की भक्ति में रमता था। देवगढ़ के शासक जनार्दन स्वामी की भक्ति, विद्वता, सदाचार और निष्ठा से प्रभावित होकर बालक एकनाथ भावुकता के साथ उनकी ओर आकर्षित हुए और अंततः उनके समर्पित शिष्य बन गए। अपने गुरु के सानिध्य में रहकर उन्होंने ज्ञानेश्वरी, अमृतानुभव और श्रीमद्भागवत जैसे गहन ग्रंथों का निष्ठापूर्वक अध्ययन किया, जिससे उनके भीतर आत्म-साक्षात्कार की चेतना जागृत हुई। गुरु की गुरु परंपरा साक्षात नारायण (विष्णु), ब्रह्मदेव, महर्षि अत्रि, दत्तात्रेय और जनार्दन स्वामी से होते हुए उन तक पहुँचती थी, जिसने उनके ज्ञान को एक दिव्य आधार प्रदान किया।
अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद गुरु की आज्ञा शिरोधार्य कर उन्होंने गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया और कर्म तथा संन्यास का एक ऐसा अनूठा समन्वय प्रस्तुत किया जो संत परंपरा में विरला ही देखने को मिलता है। लगभग चार सौ वर्ष पूर्व, जब समाज रूढ़िवादिता और छूआछूत की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, तब संत एकनाथ ने मानवता की उदार भावना से प्रेरित होकर अछूतों और समाज के वंचित तबके के उत्थान के लिए निरंतर संघर्ष किया। वे जितने महान संत थे, उतने ही श्रेष्ठ और बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि भी थे। उनसे पहले महाराष्ट्र की धरती पर इतनी व्यापक रचनात्मक प्रतिभा वाला कोई दूसरा कवि नहीं हुआ था। तत्कालीन समय में उन्हें बेहद विपरीत परिस्थितियों में साहित्य की रचना करनी पड़ी, क्योंकि एक तरफ जहाँ उर्दू और फारसी के बढ़ते प्रभाव के कारण मराठी भाषा दबाई जा रही थी, वहीं दूसरी तरफ संस्कृत के रूढ़िवादी विद्वान स्थानीय लोकभाषा मराठी में धार्मिक लेखन का कड़ा विरोध कर रहे थे। इस दोहरे दबाव के बीच उन्होंने मराठी भाषा को जन-जागरण का माध्यम बनाने का दृढ़ संकल्प लिया और चतुश्लोकी भागवत, पौराणिक कथाएं, संतों के जीवन चरित्र, रुक्मिणी स्वयंवर, भावार्थ रामायण, हस्तामलक, शुकाष्टक, स्वात्मसुख, आनंदलहरी, चिरंजीव पद तथा लोकगीतों के रूप में 'भारुड़' जैसी कालजयी कृतियों की रचना की। उनकी सर्वोत्कृष्ट कृति 'भागवत' की महानता का लोहा वाराणसी के प्रकांड पंडितों ने भी माना, वहीं लोकभाषा में रामायण पर व्यापक ग्रंथ लिखने वाले वे पहले मराठी कवि बने। उनका मुख्य उद्देश्य मनोरंजन के माध्यम से लोक-चेतना को जगाना था, जिसमें वे शत-प्रतिशत सफल रहे और इसी कारण उन्हें एक सच्चे युग-कवि की उपाधि मिली। इसके अतिरिक्त, उन्होंने ज्ञानेश्वरी की अनेक पांडुलिपियों का गहन अध्ययन और प्रामाणिक शोध करके उसकी एक शुद्ध प्रति तैयार की, जिसने भविष्य के विद्वानों के लिए साहित्यिक अनुसंधान का एक आदर्श प्रतिमान स्थापित किया। संत ज्ञानेश्वर द्वारा शुरू किए गए साहित्यिक और धार्मिक कार्यों को पूर्णता तक पहुँचाने वाले इस युगपुरुष ने अंततः 25 फरवरी 1599 (फाल्गुन वद्य षष्ठी, शक 1521) को इस नश्वर संसार का त्याग कर दिया। उनके महाप्रयाण के इस पवित्र दिन को आज भी 'एकनाथ षष्ठी' के रूप में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है, जहाँ प्रतिवर्ष पैठन में हजारों भक्त उनकी समाधि पर शीश नवाने आते हैं।
संत एकनाथ का जीवन और उनका साहित्य भारतीय समाज के लिए एक अमूल्य धरोहर है, जिन्होंने भाषा और समाज दोनों को रूढ़िवादिता के बंधनों से मुक्त कराया। एक संवेदनशील समाज सुधारक और महान युग-कवि के रूप में उनकी विरासत आज सदियों बाद भी प्रासंगिक है, जो हमें मानवता, समरसता और निश्छल भक्ति का मार्ग दिखाती रहेगी।

