तेरहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब भारतीय समाज रूढ़िवादिता, जातिगत भेदभाव और सांस्कृतिक संकीर्णता के दौर से गुजर रहा था, तब महाराष्ट्र की पावन भूमि पर एक ऐसे दिव्य नक्षत्र का उदय हुआ जिसने अपने ज्ञान, वैराग्य और अगाध भक्ति से पूरे युग को आलोकित कर दिया। वे थे संत ज्ञानेश्वर, जिन्हें आदरपूर्वक ज्ञानेश्वर माउली या ज्ञानदेव भी कहा जाता है। मात्र 21 वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल में उन्होंने न केवल आध्यात्मिक चेतना की एक नई लहर पैदा की, बल्कि मराठी भाषा और साहित्य को एक ऐसा अमर आधार प्रदान किया जो आज सात सदियों बाद भी अक्षुण्ण है। वारकरी संप्रदाय और नाथ परंपरा के प्रमुख स्तंभ रहे संत ज्ञानेश्वर ने तत्कालीन समाज की उस संकीर्ण सोच को चुनौती दी, जिसने संस्कृत को ज्ञान की एकमात्र भाषा मानकर जनसामान्य को आध्यात्मिक सत्य से वंचित कर दिया था। उन्होंने ज्ञान को महलों और कर्मकांडी पुरोहितों की मुट्ठी से निकालकर सीधे आम आदमी की भाषा में उसकी चौखट तक पहुँचाने का ऐतिहासिक कार्य किया।

संत ज्ञानेश्वर का जन्म सन् 1275 में कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर महाराष्ट्र के पैठन के समीप गोदावरी नदी के तट पर स्थित आपेगाँव में एक देशस्थ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उस समय वहाँ यादव वंश के राजा रामचंद्रदेव का शासन था, जिनका राज्य शांति, समृद्धि और कला-साहित्य के संरक्षण के लिए जाना जाता था। ज्ञानेश्वर के पिता विट्ठल पंत और माता रुक्मिणी बाई थीं। विट्ठल पंत स्वभाव से अत्यंत विरक्त और आध्यात्मिक खोज के प्रति आकुल थे। विवाह के उपरांत भी उनकी संसार के प्रति विरक्ति बनी रही और अंततः अपनी पत्नी की सहमति से वे काशी चले गए, जहाँ उन्होंने स्वामी रामाश्रम से संन्यास की दीक्षा ले ली। परंतु जब उनके गुरु को यह ज्ञात हुआ कि विट्ठल पंत अपनी पत्नी को बिना बताए या उसकी अधूरी इच्छा के सन्यासी बने हैं, तो उन्होंने विट्ठल पंत को पुनः गृहस्थ जीवन में लौटने और आलंदी जाकर पत्नी के साथ रहने का आदेश दिया। गुरु की आज्ञा शिरोधार्य कर विट्ठल पंत आलंदी लौट आए। इसके बाद उनके यहाँ चार संतानों का जन्म हुआ— निवृत्तिनाथ, ज्ञानेश्वर, सोपान और पुत्री मुक्ताबाई।

एक संन्यासी का पुनः गृहस्थ जीवन में लौटना तत्कालीन कट्टरपंथी और रूढ़िवादी ब्राह्मण समाज को कतई स्वीकार नहीं था। समाज ने इसे सनातन धर्म के विरुद्ध और अधर्म माना। इसके परिणामस्वरूप पूरे परिवार को जाति और समाज से बहिष्कृत कर दिया गया। बालक ज्ञानेश्वर और उनके भाई-बहनों को ब्राह्मण जाति में पूर्ण प्रवेश दिलाने वाले अनिवार्य यज्ञोपवीत संस्कार (जनेऊ) के अधिकार से वंचित कर दिया गया। समाज ने इस परिवार से रोटी-बेटी का संबंध तोड़ लिया, उन्हें काम देने से मना कर दिया और यहाँ तक कि बाजार से अन्न खरीदने पर भी रोक लगा दी। इस घोर सामाजिक प्रताड़ना से दुखी होकर विट्ठल पंत अपने परिवार को लेकर नासिक चले गए। सामाजिक बहिष्कार और बच्चों के भविष्य को अंधकार में देखकर विट्ठल पंत ने आलंदी के ब्राह्मणों से प्रायश्चित का उपाय पूछा। रूढ़िवादी पुरोहितों ने क्रूरता की हद पार करते हुए केवल प्राणत्याग को ही एकमात्र प्रायश्चित बताया। अपने बच्चों को सामाजिक उत्पीड़न से मुक्त कराने की अंतिम आस में विट्ठल पंत और उनकी पत्नी रुक्मिणी बाई ने एक-दूसरे के भीतर ही इंद्रायणी नदी में छलांग लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली।

माता-पिता के इस आत्म बलिदान के बाद चारों अनाथ भाई-बहन अत्यंत विकट परिस्थितियों में आ गए। परंतु विपत्ति के इन बादलों के बीच उनके भीतर का आध्यात्मिक तेज और प्रस्फुटित हुआ। बड़े भाई निवृत्तिनाथ को नासिक की एक गुफा में छिपे होने के दौरान नाथ संप्रदाय के महान योगी गहिनीनाथ से दीक्षा मिली थी। निवृत्तिनाथ ने ही आगे चलकर ज्ञानेश्वर, सोपान और मुक्ताबाई को नाथ परंपरा के गूढ़ ज्ञान और योग में दीक्षित किया। चारों भाई-बहन महान योगी और भक्ति कवि के रूप में उभरे। अपनी पात्रता सिद्ध करने और शुद्धि पत्र प्राप्त करने के लिए जब बारह वर्ष के ज्ञानेश्वर अपने भाई-बहनों के साथ पैठन के विद्वानों की सभा में पहुँचे, तो वहाँ उनका उपहास उड़ाया गया। लोककथाओं के अनुसार, जब पुरोहितों ने उनके ज्ञान का मज़ाक उड़ाया और कहा कि वेद तो केवल उच्च जातियों के लिए हैं, तब ज्ञानेश्वर ने प्रतिपादित किया कि ईश्वर का अंश हर जीव में है। इस पर क्रोधित होकर जब पुरोहितों ने पास से गुजर रहे एक भैंसे की तरफ इशारा कर चुनौती दी, तब ज्ञानेश्वर ने उस भैंसे के मस्तक पर अपना हाथ रख दिया और वह भैंसा ऊंचे और स्पष्ट स्वर में वेद मंत्रों का उच्चारण करने लगा। इस चमत्कार ने अहंकारी पुरोहितों का सिर झुका दिया। इसी तरह, बाघ की सवारी करने वाले और अपनी जादुई शक्तियों पर घमंड करने वाले महान सिद्ध योगी चांगदेव के अहंकार को ज्ञानेश्वर ने एक निर्जीव दीवार को चलाकर चूर किया, जिसके बाद चांगदेव उनकी बहन मुक्ताबाई के शिष्य बन गए।

संत ज्ञानेश्वर मराठी भाषा के पहले स्थापित दार्शनिक विचारक माने जाते हैं। मात्र 16 वर्ष की अल्पायु में, सन् 1290 में उन्होंने 'ज्ञानेश्वरी' (भावार्थ दीपिका) की रचना की, जो श्रीमद्भगवद्गीता पर लिखी गई एक असाधारण और कालजयी टीका है। उनके वचनों को उनके शिष्य सच्चिदानंद ने लिपिबद्ध किया था। ज्ञानेश्वर ने इस ग्रंथ की रचना संस्कृत के बजाय जनसामान्य की प्राकृत मराठी भाषा में और लोकप्रिय 'ओवी' छंद में की ताकि समाज का सबसे वंचित और साधारण व्यक्ति भी जीवन के गूढ़ दर्शन को समझ सके। यह कार्य भारतीय इतिहास में सांस्कृतिक वर्चस्व के विरुद्ध एक महान क्रांति की तरह था। इसके बाद अपने भाई के आग्रह पर उन्होंने 'अमृतानुभव' नामक एक स्वतंत्र दार्शनिक ग्रंथ की रचना की, जो अद्वैत वेदांत और शुद्ध चेतना के गहन अनुभवों को समेटे हुए है। इसके साथ ही उन्होंने चांगदेव को उपदेश देते हुए 'चांगदेव पासष्टी' के 65 श्लोकों और भगवान विठ्ठल के प्रति अनन्य भक्ति से सराबोर सैकड़ों 'अभंगों' की रचना की। ज्ञानेश्वरी के अंत में उन्होंने संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए ईश्वर से 'पसायदान' (ईश्वरीय अनुग्रह की प्रार्थना) मांगा, जिसमें उन्होंने स्वयं के लिए कुछ न मांगकर पूरे विश्व के लिए सुख, शांति और दुर्जनों के सद्बुद्धि की कामना की।

ज्ञानेश्वर के विचार उपनिषदों, भगवद्गीता और नाथ परंपरा के हठयोग तथा शिव-विष्णु की एकता पर आधारित थे। उन्होंने प्रतिपादित किया कि यह संसार ईश्वर का ही विलास (चिद्विलास) है, कोई भ्रम या मिथ्या नहीं है, इसलिए उन्होंने कर्मों के त्याग के बजाय कर्मयोग की वकालत की। अपनी साहित्यिक कृतियों को पूर्ण करने के बाद उन्होंने अपने परम मित्र और समकालीन संत नामदेव के साथ मिलकर पूरे भारतवर्ष के तीर्थों की यात्रा की और लोगों को जाति-पांत के भेद से ऊपर उठकर प्रेम और समानता पर आधारित वारकरी संप्रदाय से जोड़ा। इस यात्रा से लौटने के बाद, मात्र 21 वर्ष की आयु में, सन् 1296 में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन आलंदी में संत ज्ञानेश्वर ने स्वेच्छा से अष्टांग योग की परम अवस्था में प्रवेश करते हुए 'संजीवन समाधि' ले ली। आज भी आलंदी के सिद्धेश्वर मंदिर परिसर में उनकी समाधि स्थित है, जहाँ हर वर्ष आषाढ़ मास में लाखों वारकरी भक्त उनके प्रतीक 'पादुका' को पालकी में रखकर आलंदी से पंढरपुर तक की प्रसिद्ध 'वारी' यात्रा निकालते हैं। संत ज्ञानेश्वर का जीवन और दर्शन यह सिद्ध करता है कि भौतिक आयु चाहे कितनी भी कम क्यों न हो, यदि वह लोक कल्याण, ज्ञान और निश्छल भक्ति के लिए समर्पित हो, तो वह युगों-युगों के लिए अमर हो जाती है और आने वाली पीढ़ियों का मार्ग प्रशस्त करती रहती है।

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