कौन थे संत चोखामेला? जानिए भारत के पहले दलित कवि की भक्ति और संघर्ष की अमर गाथा।
महाराष्ट्र के 13वीं शताब्दी के महान वारकरी संत चोखामेला का जीवन संघर्ष, संत नामदेव से दीक्षा, अभंग रचनाएं और सामाजिक समरसता में उनका ऐतिहासिक प्रभाव।

तेरहवीं और चौदहवीं शताब्दी के सामाजिक और धार्मिक परिदृश्य में अपनी भक्ति से क्रांति लाने वाले संत चोखामेला का नाम भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। महाराष्ट्र के बुल्ढाणा जिले के देउलगॉंव राजा तालुका स्थित मेहुना राजा गॉंव में जन्मे चोखामेला को भारत के पहले निम्न-जाति के कवियों में गिना जाता है, जिन्होंने तत्कालीन समाज की कठोर जातिवादी व्यवस्था और असमानता को झेलते हुए भी ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम का परिचय दिया। वे महार जाति से संबंध रखते थे, जिसे उस दौर में समाज में बेहद निचला स्थान प्राप्त था और इसी सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण उन्हें जीवनभर अत्यधिक भेदभाव का सामना करना पड़ा। उनका प्रारंभिक जीवन और निवास मुख्य रूप से महाराष्ट्र के मंगलवेढा में बीता, जहाँ उन्होंने समाज के उच्च वर्ग के लोगों के खेतों की रखवाली करने और वहाँ मजदूरी करने का कठिन कार्य किया। चोखामेला का पूरा परिवार गहरी आध्यात्मिक चेतना से ओत-प्रोत था और वे सभी वारकरी संप्रदाय के अनुयायी थे। उनके इस कठिन जीवन सफर में उनकी पत्नी सोयराबाई, पुत्र कर्ममेला, बहन निर्मला और बहनोई बंका ने हर कदम पर उनका साथ दिया, जो स्वयं भी आध्यात्मिक विचारों के धनी थे।
चोखामेला के जीवन में सबसे बड़ा आध्यात्मिक मोड़ तब आया जब उनकी मुलाकात प्रसिद्ध संत-कवि नामदेव से हुई। भगवान विट्ठल (विठोबा) के प्रति चोखामेला के मन में बचपन से ही अगाध श्रद्धा थी, लेकिन जब उन्होंने पंढरपुर की यात्रा के दौरान संत नामदेव के कीर्तनों को सुना, तो वे उनके उपदेशों से अत्यंत प्रभावित हुए। संत नामदेव ने चोखामेला की सच्ची भक्ति को पहचाना और उन्हें आध्यात्मिकता की दीक्षा दी, जिसके बाद चोखामेला पूरी तरह भक्ति रस में डूब गए। वे बाद में स्थायी रूप से पंढरपुर आ गए, लेकिन सामाजिक कुरुपताओं ने यहाँ भी उनका पीछा नहीं छोड़ा। पारंपरिक इतिहास के अनुसार, तत्कालीन उच्च जातियों ने उन्हें न तो मुख्य विट्ठल मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति दी और न ही मंदिर के द्वार पर खड़े होने दिया। इस घोर अपमान और सामाजिक बहिष्कार के बावजूद उनकी आस्था विचलित नहीं हुई और उन्होंने चंद्रभागा नदी के दूसरे तट पर अपनी एक छोटी सी कुटिया बना ली और वहीं से भगवान विट्ठल की आराधना में लीन रहने लगे।
अपनी इसी विरह और भक्ति की अवस्था में उन्होंने कई अभंगों (भक्ति गीतों) की रचना की, जो आज भी मराठी साहित्य और लोक-चेतना की अमूल्य धरोहर हैं। उनका लिखा एक प्रसिद्ध अभंग 'अबीर गुलाल उधळीत रंग' आज भी अत्यंत श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ गाया जाता है। चोखामेला का जीवन जितना संघर्षपूर्ण था, उनका अंत भी उतना ही कारुणिक रहा। पंढरपुर के पास मंगलवेढा में एक दीवार के निर्माण कार्य के दौरान अचानक वह दीवार ढह गई, जिसके मलबे में दबकर कई मजदूरों की जान चली गई और चोखामेला भी उन्हीं में से एक थे। लोक कथाओं के अनुसार, मृत्यु के बाद भी उनकी भक्ति का चमत्कार देखने को मिला, जब यह माना गया कि चोखामेला की अस्थियों से 'विट्ठल, विट्ठल' की ध्वनि गूंज रही थी, जो मंदिर दर्शन की उनकी अंतिम इच्छा को दर्शाती थी। उनकी इन्हीं पवित्र अस्थियों को पंढरपुर के विट्ठल मंदिर की सीढ़ियों के नीचे दफनाया गया, जहाँ आज भी उनकी समाधि देखी जा सकती है। आधुनिक काल में उनके योगदान को जीवित रखने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद प्रभाकर कायंदे ने देउलगॉंव राजा में "चोखामेला उत्सव" मनाने की शुरुआत की। इसके साथ ही, रोहिणी मोकाशी-पुणेकर द्वारा अनूदित 'ऑन द थ्रेशोल्ड: सॉन्ग्स ऑफ चोखामेला' और चंद्रकांत कालुराम म्हात्रे द्वारा अनूदित 'वन हंड्रेड पोयम्स ऑफ चोखामेला' जैसी पुस्तकों ने वैश्विक स्तर पर उनकी रचनाओं को पहुँचाया। आधुनिक भारत के निर्माता डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने भी चोखामेला के ऐतिहासिक संघर्ष और महत्व को रेखांकित करते हुए अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'द अनटचेबल्स: हू आर दे एंड व्हाई दे बिगेम अनटचेबल्स' को चोखामेला, नंदनार और रविदास की स्मृति को समर्पित किया, जो उनके अविस्मरणीय प्रभाव को दर्शाता है।
संत चोखामेला का जीवन केवल धार्मिक भक्ति का प्रतीक नहीं है, बल्कि वह मानवीय गरिमा, सामाजिक न्याय और मूक प्रतिरोध की एक ऐसी कालजयी गाथा है जो सदियों बाद आज भी प्रासंगिक है। विट्ठल मंदिर की चौखट पर बनी उनकी समाधि इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सच्ची भक्ति को किसी भी सामाजिक बंधन या दीवारों में कैद नहीं किया जा सकता, और उनका यह अद्वितीय त्याग तथा साहित्यिक योगदान भारतीय इतिहास में हमेशा सामाजिक समरसता की प्रेरणा देता रहेगा।

