कौन थीं संत बहिनाबाई? तुकाराम की अनन्य शिष्या जिन्होंने भक्ति को नई आवाज दी
17वीं शताब्दी के महाराष्ट्र में संत तुकाराम की शिष्या बहिनाबाई ने सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देकर भक्ति आंदोलन और वारकरी साहित्य में अभूतपूर्व योगदान दिया।

सत्रहवीं शताब्दी का महाराष्ट्र भक्ति आंदोलन, संत परंपरा और आध्यात्मिक जागरण का केंद्र बन चुका था। इसी कालखंड में एक ऐसी महिला संत कवयित्री का उदय हुआ, जिसने अपने अभंगों, अटूट गुरु भक्ति और सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध साहसपूर्ण जीवन के माध्यम से वारकरी संप्रदाय में अमिट स्थान बनाया। संत बहिनाबाई केवल एक कवयित्री नहीं थीं, बल्कि वे उस युग की ऐसी आध्यात्मिक चेतना थीं, जिन्होंने भक्ति को जनमानस की सरल भाषा में अभिव्यक्त किया। संत तुकाराम की शिष्या के रूप में प्रसिद्ध बहिनाबाई ने अपने जीवन में अनेक संघर्षों, सामाजिक प्रताड़नाओं और व्यक्तिगत कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन उन्होंने कभी अपनी भक्ति और आध्यात्मिक मार्ग से समझौता नहीं किया।
संत बहिनाबाई का जन्म लगभग 1551 में देवगाँव (रंगारा) में हुआ था, जो वेलगंगा नदी के किनारे स्थित था। उनके पिता का नाम आज़ी और माता का नाम जानकी था। बाल्यकाल से ही उनमें आध्यात्मिकता के प्रति गहरा आकर्षण दिखाई देने लगा था। वे कथा-कीर्तन सुनने, पुराणों का श्रवण करने और संतों की सेवा में विशेष रुचि रखती थीं। उस समय समाज में बाल विवाह की प्रथा प्रचलित थी, जिसके कारण मात्र पाँच वर्ष की आयु में उनका विवाह रत्नाकर पाठक नामक लगभग तीस वर्षीय व्यक्ति से कर दिया गया। उनके पति पहले से दो बच्चों के पिता थे। विवाह के बाद भी बहिनाबाई का मन सांसारिक जीवन में पूरी तरह नहीं रम सका। गरीबी, सीमित संसाधनों और शिक्षा के अभाव के बावजूद उनके भीतर भक्ति और संतोष की भावना निरंतर प्रबल होती गई।
बहिनाबाई का अधिकांश समय भगवान पांडुरंग के नाम-स्मरण, संत संगति और आध्यात्मिक चिंतन में व्यतीत होता था। खेतों में काम करते समय भी उनके मुख से सहज रूप में अभंग फूट पड़ते थे। उनकी भक्ति धीरे-धीरे ऐसी साधना में परिवर्तित हो गई, जिसने उन्हें संत परंपरा के केंद्र तक पहुँचा दिया। कोल्हापुर में जयराम स्वामी के कथा-कीर्तन और संत तुकाराम के अभंगों ने उनके जीवन को गहराई से प्रभावित किया। तुकाराम के अभंग सुनने के बाद उनके भीतर गुरु भक्ति का ऐसा भाव जागृत हुआ कि वे उन्हें अपना सच्चा गुरु मानने लगीं। वे दिन-रात तुकोबा के अभंगों का पाठ करतीं और उनके दर्शन की कामना में लीन रहतीं।
हालाँकि, संत तुकाराम के वैकुंठ गमन के कारण बहिनाबाई उनसे प्रत्यक्ष रूप से नहीं मिल सकीं। कहा जाता है कि उनकी अटूट भक्ति और साधना से प्रसन्न होकर संत तुकाराम ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और गुरु उपदेश प्रदान किया। इस घटना ने उनके जीवन की दिशा पूरी तरह बदल दी। इसके बाद उन्होंने अपने अभंगों में गुरु तुकाराम और उनकी गुरु परंपरा का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया। वे अपने गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण व्यक्त करते हुए लिखती हैं कि सच्चे गुरु से मिलना उनके जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य था और उनके कर्म उसी क्षण सरल हो गए।
उस समय समाज में एक ब्राह्मण महिला का संत तुकाराम जैसा गैर-ब्राह्मण गुरु स्वीकार करना विवाद का विषय बन गया। सनातनी और रूढ़िवादी वर्ग ने इसका तीव्र विरोध किया। मंबाजी नामक व्यक्ति द्वारा उन्हें अत्यधिक प्रताड़ना भी सहनी पड़ी, लेकिन उन्होंने अपने गुरु के प्रति श्रद्धा और भक्ति को कभी नहीं छोड़ा। बहिनाबाई का यह संघर्ष केवल व्यक्तिगत नहीं था, बल्कि उस समय की सामाजिक व्यवस्था और जातिगत रूढ़ियों के विरुद्ध भी एक मौन प्रतिरोध था। उन्होंने अपने अभंगों में “ब्राह्मण कौन है” जैसे विषय उठाकर ब्राह्मणवादी संकीर्णता की तीखी आलोचना की। विशेष बात यह थी कि वे स्वयं ब्राह्मण परिवार से थीं, इसलिए उनके विचारों का सामाजिक प्रभाव और भी व्यापक हुआ।
संत बहिनाबाई की रचनाएँ उनकी सहज भक्ति और गहन आध्यात्मिक अनुभूति का प्रमाण हैं। उनके नाम पर लगभग 732 रचनाएँ उपलब्ध हैं, जिनमें अभंग, ओवियाँ, श्लोक और आरतियाँ शामिल हैं। उनकी भाषा सरल, स्पष्ट और अत्यंत भावपूर्ण है। उनके अभंगों में भक्ति के साथ-साथ वेदांत और आध्यात्मिक चिंतन का भी सुंदर समन्वय दिखाई देता है। उन्होंने संत तुकाराम के व्यक्तित्व और चरित्र को अपनी कविताओं में जिस सजीवता से प्रस्तुत किया, वह उन्हें अन्य संत कवियों से अलग पहचान देता है। उनकी प्रसिद्ध रचना “संत कृपा झाली, इमारत फळा आली” आज भी वारकरी परंपरा में अत्यंत श्रद्धा के साथ गाई जाती है। इस अभंग में उन्होंने संत परंपरा को एक आध्यात्मिक मंदिर के रूप में चित्रित किया, जिसकी नींव ज्ञानदेव ने रखी और जिसे आगे अन्य संतों ने पूर्णता प्रदान की।
संत बहिनाबाई के जीवन से जुड़ी कई चमत्कारिक घटनाएँ भी लोकश्रुतियों में प्रसिद्ध हैं। ऐसा माना जाता है कि उन्हें अपने बारह पूर्वजन्मों का स्मरण था और उन्होंने अपने पुत्र को उन जन्मों से संबंधित पैंतीस अभंग सुनाए थे। एक अन्य प्रसिद्ध कथा के अनुसार, एकादशी के अवसर पर पंढरपुर की यात्रा के दौरान उन्हें तेज बुखार हो गया, लेकिन पांडुरंग के दर्शन की तीव्र इच्छा के कारण उन्होंने अपना फटा हुआ कंबल एक पेड़ पर रखकर उससे लौटने तक प्रतीक्षा करने की प्रार्थना की। कहा जाता है कि उनके लौटने तक वह पेड़ बर्फ की तरह ठंडा हो गया था। इसी प्रकार, रामदास स्वामी द्वारा दी गई हनुमान की मूर्ति के उनके हाथ से पवित्र जल पी लेने की कथा भी अत्यंत प्रसिद्ध है। वह मूर्ति आज भी शिउर गाँव स्थित उनके निवास मंदिर में सुरक्षित मानी जाती है।
अपने अंतिम समय तक संत बहिनाबाई भक्ति और अभंग रचना में लीन रहीं। कहा जाता है कि उन्होंने अपने प्रसिद्ध अभंग “घट फुटलियावरी, नभा नभाचे अंतरी” का पाठ करने के बाद 2 अक्टूबर 1700 को देह त्याग दिया। शिउर गाँव में उनकी समाधि आज भी श्रद्धालुओं और वारकरी परंपरा के अनुयायियों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है।
संत बहिनाबाई का जीवन भारतीय संत परंपरा में महिला आध्यात्मिक चेतना, गुरु भक्ति और सामाजिक साहस का अद्वितीय उदाहरण है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सच्ची भक्ति जाति, लिंग और सामाजिक बंधनों से कहीं ऊपर होती है। उनके अभंग केवल धार्मिक रचनाएँ नहीं हैं, बल्कि वे उस युग की सामाजिक चेतना, आध्यात्मिक अनुभव और मानवीय संवेदनाओं का जीवंत दस्तावेज हैं। आज भी संत बहिनाबाई का नाम मराठी भक्ति साहित्य और वारकरी परंपरा में अत्यंत सम्मान और श्रद्धा के साथ लिया जाता है, और उनकी वाणी आने वाली पीढ़ियों को भक्ति, साहस और आध्यात्मिक समर्पण की प्रेरणा देती रहती है।

