कौन थीं संत मुक्ताबाई? नाथ परंपरा की पहली महिला सद्गुरु की अद्भुत गाथा
संत ज्ञानेश्वर की बहन मुक्ताबाई ने अभंग, योग साधना और नाथ परंपरा के माध्यम से महाराष्ट्र की संत परंपरा को नई दिशा दी।

तेरहवीं शताब्दी का महाराष्ट्र भक्ति, योग और आध्यात्मिक चेतना के अद्भुत संगम का साक्षी था। इसी दौर में एक ऐसी संत कवयित्री और योगिनी का उदय हुआ, जिसने कम आयु में ही अध्यात्म, ज्ञान और भक्ति की ऐसी मिसाल प्रस्तुत की कि वह वारकरी और नाथ संप्रदाय की अमर विभूति बन गईं। संत मुक्ताबाई, जिन्हें प्रेम से ‘मुक्ताई’ कहा जाता है, केवल संत ज्ञानेश्वर की बहन भर नहीं थीं, बल्कि स्वयं में एक सिद्ध योगिनी, संत कवयित्री और नाथ परंपरा की पहली महिला सद्गुरु मानी जाती हैं। उनका जीवन त्याग, साधना, आध्यात्मिक तेज और लोककल्याण की भावना से ओतप्रोत था।
संत मुक्ताबाई का जन्म महाराष्ट्र के आपेगांव में लगभग 1279 ईस्वी में हुआ था। उनका पूरा नाम मुक्ताई विठ्ठलपंत कुलकर्णी था। उनके पिता विठ्ठलपंत और माता रुख्मिणी धार्मिक प्रवृत्ति के थे। उनके बड़े भाइयों में संत निवृत्तिनाथ, संत ज्ञानेश्वर और संत सोपानदेव शामिल थे। परिवार नाथ संप्रदाय की गुरु परंपरा से जुड़ा हुआ था, जिसमें मत्स्येंद्रनाथ, गोरखनाथ, गहिनीनाथ, निवृत्तिनाथ और फिर मुक्ताबाई का स्थान माना जाता है। चूंकि उनके पिता संन्यास ग्रहण कर चुके थे, इसलिए समाज ने पूरे परिवार का बहिष्कार किया और चारों भाई-बहनों को बचपन से ही अनेक कठिनाइयों और सामाजिक अपमान का सामना करना पड़ा। माता-पिता के निधन के बाद छोटी उम्र में ही मुक्ताबाई ने जीवन की कठोर वास्तविकताओं को देखा और अपने भाइयों का सहारा बनीं।
मुक्ताबाई ने अपने बड़े भाई निवृत्तिनाथ से नाथ संप्रदाय की दीक्षा प्राप्त की। ज्ञानेश्वर और मुक्ताबाई के बीच केवल भाई-बहन का ही नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य का भी गहरा संबंध था। आध्यात्मिक साधना के दौरान मुक्ताबाई अपने सभी संदेह ज्ञानेश्वर से पूछती थीं और उनके मार्गदर्शन में साधना के उच्च स्तर तक पहुंचीं। कहा जाता है कि एक अवसर पर ज्ञानेश्वर ने मुक्ताबाई से कहा था कि वह ‘अष्टम समाधि’ की अवस्था तक पहुंच चुकी हैं और अब उनके लिए साधना का सर्वोच्च मार्ग खुल चुका है। यह प्रसंग ‘ज्ञानेश्वर द्वारा मुक्ताबाई को दी गई सनद’ के रूप में प्रसिद्ध है।
बाल्यावस्था में ही मुक्ताबाई की आध्यात्मिक प्रतिभा लोगों को चकित करने लगी थी। जब ज्ञानेश्वर और उनके भाई-बहन पैठण गए, तब वहां के लोगों ने मुक्ताबाई को ‘आदिमाता’ और ‘ब्रह्मचित्कला’ जैसे सम्मानजनक नामों से संबोधित किया। उनकी वाणी में गहन आध्यात्मिकता और लोकमंगल की भावना थी। उनके अभंगों में सोहम साधना, योग अनुभव, संत महिमा, दर्शन और मुक्त अवस्था का अद्भुत वर्णन मिलता है। यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने अपने शिष्यों को ‘सोहम मंत्र’ की शिक्षा भी दी थी।
संत मुक्ताबाई का सबसे चर्चित योगदान ‘ताटी अभंग’ माना जाता है। इन अभंगों में उन्होंने संत ज्ञानेश्वर से संसार से विमुख होकर एकांत में न रहने और समाज के कल्याण के लिए ज्ञान का द्वार खोलने की प्रार्थना की थी। कहा जाता है कि इन्हीं अभंगों से प्रेरित होकर ज्ञानेश्वर ने ‘ज्ञानेश्वरी’ जैसे महान ग्रंथ की रचना की। मुक्ताबाई की यह दृष्टि केवल व्यक्तिगत मोक्ष तक सीमित नहीं थी, बल्कि समाज के सामान्य लोगों तक आध्यात्मिक ज्ञान पहुंचाने की थी।
उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रसंग योगीराज चांगदेव से जुड़ा है। चांगदेव अपनी योग सिद्धियों और चमत्कारों के कारण अत्यंत प्रसिद्ध थे और उनमें अहंकार भी आ गया था। जब वह ज्ञानेश्वर और उनके भाई-बहनों से मिलने पहुंचे, तब मुक्ताबाई ने अपने आध्यात्मिक ज्ञान और विनम्रता से उनका अहंकार समाप्त कर दिया। चांगदेव ने मुक्ताबाई को अपना गुरु स्वीकार कर लिया। बाद में मुक्ताबाई ने उन्हें ‘चांगदेव पासष्टी’ का अर्थ समझाया और उनके साथ गुरु-शिष्य का संबंध स्थापित हुआ। चांगदेव ने स्वयं स्वीकार किया था कि मुक्ताबाई के मार्गदर्शन से उन्हें सच्चे ज्ञान और शांति का अनुभव हुआ।
संत नामदेव के जीवन में भी मुक्ताबाई की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। जब नामदेव ज्ञानेश्वर और उनके भाई-बहनों से मिलने आए, तब मुक्ताबाई ने उन्हें यह समझाने का प्रयास किया कि सद्गुरु के बिना ईश्वर प्राप्ति संभव नहीं है। इसी प्रसंग के बाद नामदेव ने विसोबा खेचर को अपना गुरु स्वीकार किया। मुक्ताबाई के आध्यात्मिक प्रभाव ने उस समय के अनेक संतों और योगियों को नई दिशा दी।
मुक्ताबाई का साहित्य मराठी संत परंपरा की अनमोल धरोहर माना जाता है। उनके केवल 42 अभंग लंबे समय तक प्रसिद्ध रहे, लेकिन बाद में उनके 202 अभंग उपलब्ध हुए, जिनमें योग, भक्ति, संत परंपरा और दर्शन का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। ‘ज्ञानबोध’ नामक ग्रंथ में निवृत्तिनाथ और मुक्ताबाई के संवाद भी मिलते हैं, जो उनके गहन आध्यात्मिक चिंतन को दर्शाते हैं। इसके अतिरिक्त ‘मुक्ताबाई-चांगदेव संवाद’ और अन्य रचनाएं भी उनकी साहित्यिक प्रतिभा का प्रमाण हैं।
संत मुक्ताबाई का जीवन केवल आध्यात्मिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं था, बल्कि लोकमानस में भी उनकी गहरी छाप रही। लोकगीतों और जनश्रुतियों में उन्हें आदिमाया, करुणामयी बहन और दिव्य योगिनी के रूप में याद किया जाता है। उनकी सादगी, कम आयु में प्राप्त आध्यात्मिक ऊंचाई और भाइयों के प्रति उनका स्नेह आज भी लोककथाओं और भक्ति परंपरा का हिस्सा है।
ज्ञानेश्वर के समाधि लेने के बाद मुक्ताबाई ने भी अपने जीवन को वैराग्य और साधना में समर्पित कर दिया। वह कुछ समय तक अपने शिष्य योगीराज चांगदेव के साथ रहीं और बाद में यात्राओं के दौरान ‘ज्ञानबोध’ जैसे ग्रंथ की रचना की। अंततः 1297 ईस्वी में उन्होंने तपितीरी क्षेत्र में समाधि ली। उनकी समाधि महाराष्ट्र के जलगांव जिले के मुक्ताईनगर क्षेत्र में स्थित मानी जाती है, जो आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है।
संत मुक्ताबाई भारतीय संत परंपरा की उन विरल विभूतियों में शामिल हैं, जिन्होंने अत्यंत कम आयु में ज्ञान, भक्ति और योग की ऐसी ऊंचाइयों को छुआ, जिसे आज भी संत साहित्य और नाथ परंपरा में आदर के साथ स्मरण किया जाता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान उम्र या लिंग का मोहताज नहीं होता। एक संत कवयित्री, योगिनी और सद्गुरु के रूप में उनकी विरासत भारतीय आध्यात्मिक इतिहास में सदैव अमर रहेगी।

