राजस्थान के रेतीले धोरों से निकलकर सात समंदर पार अपनी कला का परचम लहराने वाली रूमा देवी की कहानी अदम्य साहस और अटूट संकल्प की एक मिसाल है।

बाड़मेर के रावतसर गांव में 1988 में जन्मी रूमा देवी का शुरुआती जीवन अभावों और पारंपरिक सीमाओं के बीच बीता, जहाँ आठवीं कक्षा के बाद उनकी पढ़ाई छूट गई। बचपन में अपनी दादी से कशीदाकारी की बारीकियां सीखने वाली रूमा देवी के जीवन में संघर्ष का दौर तब और गहरा हो गया जब मात्र 17 वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया और उन्होंने अपने पहले पुत्र को जन्म के महज 48 घंटों के भीतर खो दिया। इस व्यक्तिगत त्रासदी और आर्थिक तंगी ने उन्हें अपनी कला को ही अपना संबल बनाने के लिए प्रेरित किया। साल 2006 में उन्होंने अपने ससुराल में महिलाओं को एकजुट कर मात्र 10 सदस्यों के साथ एक स्वयं सहायता समूह की नींव रखी, जहाँ प्रत्येक महिला के 100 रुपये के योगदान से कुशन और बैग बनाने का सफर शुरू हुआ। उनकी उद्यमिता और नेतृत्व क्षमता का विस्तार तब हुआ जब वे 2008 में बाड़मेर के ग्रामीण विकास चेतना संस्थान से जुड़ीं और अपनी कार्यकुशलता के बल पर 2010 में इस संस्था की अध्यक्ष बनीं। इसी साल दिल्ली के रफी मार्ग पर लगी उनकी पहली प्रदर्शनी ने उन्हें एक नई पहचान दी, जिसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

उनकी सुई-धागे की कला ने धीरे-धीरे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर दस्तक दी, जिसका परिणाम 2016 में राजस्थान हेरिटेज वीक में उनके पहले फैशन शो के रूप में सामने आया। रूमा देवी की इसी असाधारण उपलब्धि के लिए भारत सरकार ने उन्हें 2018 में देश के सर्वोच्च महिला नागरिक सम्मान 'नारी शक्ति पुरस्कार' से नवाजा। उनकी ख्याति तब और बढ़ी जब वे 'कौन बनेगा करोड़पति' में अमिताभ बच्चन के साथ मंच साझा करती दिखीं और हार्वर्ड विश्वविद्यालय, बोस्टन में आयोजित 17वें अखिल भारतीय सम्मेलन में पैनलिस्ट के तौर पर आमंत्रित की गईं। 'राजीविका' की स्टेट ब्रांड एंबेसडर और 'ट्राइब्स इंडिया' की गुडविल एंबेसडर के रूप में उन्होंने हजारों ग्रामीण महिलाओं के जीवन में आर्थिक स्वावलंबन का उजाला फैलाया है। श्रीलंका सरकार द्वारा 'शिल्प अभिमन्यु पुरस्कार' और 'टीएफआई डिजाइनर ऑफ द ईयर 2019' जैसे सम्मानों से विभूषित रूमा देवी ने हस्तशिल्प के माध्यम से न केवल राजस्थान की परंपरा को जीवित रखा, बल्कि आधुनिक फैशन जगत में भी पारंपरिक कशीदाकारी को एक प्रतिष्ठित स्थान दिलाया। आज उनकी विरासत केवल पुरस्कारों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह उन हजारों गुमनाम कारीगरों की आवाज बन चुकी हैं जिन्होंने सदियों पुरानी कला को अपनी आजीविका का सशक्त माध्यम बनाया है।

Pratahkal HQ

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