शारीरिक अक्षमता कभी भी बौद्धिक और आध्यात्मिक ऊंचाइयों के मार्ग में बाधा नहीं बन सकती, इस सत्य का जीवंत प्रतीक हैं सनातन परंपरा के महान ऋषि अष्टावक्र। अद्वैत वेदांत के अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ 'अष्टावक्र गीता' के प्रणेता महर्षि अष्टावक्र का जीवन ज्ञान, दृढ़ संकल्प और पितृभक्ति का एक ऐसा विलक्षण आख्यान है जो सदियों से मानवता को प्रेरित करता आ रहा है। उनका नाम 'अष्टावक्र' दो शब्दों से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है 'आठ स्थानों से टेढ़ा-मेढ़ा'। उनके इस विशिष्ट शारीरिक स्वरूप के पीछे एक अत्यंत कौतूहलपूर्ण और ऐतिहासिक कथा जुड़ी है। ऋषि उद्दालक के अत्यंत मेधावी शिष्य कहोड़ को संपूर्ण वेदों का ज्ञान प्राप्त करने के बाद, गुरु ने अपनी परम सुगुणी और सुंदर पुत्री सुजाता का विवाह उनके साथ कर दिया था। विवाह के कुछ समय पश्चात सुजाता गर्भवती हुईं। एक दिन जब ऋषि कहोड़ अत्यंत मग्न होकर वेदों का सस्वर पाठ कर रहे थे, तभी सुजाता के गर्भ में पल रहे बालक ने भीतर से ही टोकते हुए कहा कि पिताजी, आप वेदों का अशुद्ध उच्चारण कर रहे हैं। गर्भस्थ शिशु के मुख से अपने ज्ञान की इस प्रकार आलोचना सुनकर ऋषि कहोड़ अत्यंत क्रोधित हो उठे और उन्होंने अपने ही होने वाले पुत्र को शाप दे दिया कि गर्भ से ही मेरा अपमान करने के कारण तुम्हारा शरीर आठ स्थानों से विकृत और टेढ़ा-मेढ़ा हो जाएगा।

शाप के इस गंभीर घटनाक्रम के बाद बालक के जन्म से पूर्व ही एक और बड़ी त्रासदी घटित हुई। ऋषि कहोड़ अचानक महाराज जनक की राजसभा में पहुंचे, जहां उनका शास्त्रार्थ राजा के दरबारी विद्वान बंदि से हुआ। इस कठिन शास्त्रार्थ में ऋषि कहोड़ पराजित हो गए और शर्त के अनुसार उन्हें जल में डुबो दिया गया। इस दुखद घटना के पश्चात ही बालक अष्टावक्र का जन्म हुआ। पिता की अनुपस्थिति में बालक अष्टावक्र ने अपने नाना महर्षि उद्दालक को ही अपना पिता माना और अपने मामा श्वेतकेतु को अपना भाई समझा। बालक के बालमन में पिता की कोई कमी नहीं थी, परंतु एक दिन जब वह अपने नाना उद्दालक की गोद में खेल रहे थे, तब श्वेतकेतु ने उन्हें वहां से खींचते हुए कहा कि तुम यहाँ से हट जाओ, यह तुम्हारे पिता की गोद नहीं है। इस व्यवहार से बालक अष्टावक्र अत्यंत आहत हुए और सीधे अपनी माता सुजाता के पास जाकर अपने वास्तविक पिता के विषय में सत्य जानने की जिज्ञासा प्रकट की। माता सुजाता ने अश्रुपूरित नेत्रों से अष्टावक्र को उनके पिता के शाप और महाराज जनक की सभा में बंदि से पराजित होकर जलमग्न होने की पूरी व्यथा सुना दी।

पिता के साथ हुए इस अन्याय और सत्य को जानने के बाद, मात्र बारह वर्ष की अल्पायु में ही अष्टावक्र के भीतर अपने पिता के सम्मान को वापस लाने की तीव्र इच्छा जाग्रत हुई। वे अपने मामा श्वेतकेतु के साथ महाराज जनक के यज्ञ स्थल की ओर चल पड़े ताकि वे बंदि को शास्त्रार्थ में चुनौती दे सकें। जब वे यज्ञशाला के मुख्य द्वार पर पहुंचे, तो द्वारपालों ने उन्हें भीतर जाने से रोक दिया और कहा कि यहाँ बच्चों का प्रवेश वर्जित है। इस पर बालक अष्टावक्र ने अत्यंत विद्वतापूर्ण उत्तर देते हुए कहा कि केवल बाल सफेद हो जाने या उम्र के बढ़ जाने से ही कोई व्यक्ति महान नहीं हो जाता, बल्कि जो वेदों के गूढ़ ज्ञान से संपन्न है और जिसकी बुद्धि तीव्र है, वही वास्तव में महानता का अधिकारी है। बालक की इस अकाट्य तार्किकता को देखकर द्वारपाल स्तब्ध रह गए और उन्हें मार्ग दे दिया। राजसभा में प्रवेश करते ही अष्टावक्र ने सीधे बंदि को शास्त्रार्थ के लिए ललकारा। बालक की इस निर्भीकता को देखकर महाराज जनक ने पहले स्वयं उनकी परीक्षा लेने का निश्चय किया और ब्रह्मांड के रहस्य से जुड़ा एक अत्यंत जटिल प्रश्न पूछा कि वह पुरुष कौन है जो ब्रह्मांड के तीस घटकों, बारह भागों, चौबीस पर्वों और तीन सौ साठ अक्षरों को जानता है। अष्टावक्र ने बिना किसी संकोच के तुरंत उत्तर दिया कि चौबीस पक्षों, छह ऋतुओं, बारह महीनों और तीन सौ साठ दिनों का यह संवत्सर रूपी कालचक्र ही वह पुरुष है, जो आपकी रक्षा करे।

अष्टावक्र के इस सटीक उत्तर से प्रभावित होकर महाराज जनक ने पुनः एक और पहेलीनुमा प्रश्न पूछा कि वह कौन है जो सोते हुए भी अपनी आँखें बंद नहीं करता, जन्म के बाद भी जिसमें गति नहीं होती, कौन हृदयहीन है और कौन अत्यंत तीव्र गति से आगे बढ़ता है। बालक ऋषि ने सहजता से उत्तर दिया कि एक मछली सोते समय भी अपनी आँखें बंद नहीं करती, अंडा जन्म लेने के बाद भी स्वयं हिल-डुल नहीं सकता, पत्थर पूरी तरह से हृदयहीन होता है और नदी हमेशा तीव्र गति से आगे बढ़ती है। अष्टावक्र की इस असाधारण प्रज्ञा और मेधा से पूरी तरह संतुष्ट होकर महाराज जनक ने उन्हें बंदि के साथ मुख्य शास्त्रार्थ की अनुमति दे दी। इसके बाद बंदि और अष्टावक्र के बीच संख्याओं के प्रतीकात्मक महत्व पर एक अद्भुत और ऐतिहासिक संवाद शुरू हुआ। बंदि ने एक से शुरुआत करते हुए कहा कि एक सूर्य पूरे जगत को आलोकित करता है, देवताओं का राजा इंद्र अकेला वीर है और यमराज भी एक हैं। अष्टावक्र ने दो की संख्या पर बोलते हुए कहा कि इंद्र और अग्नि दो देवता हैं, नारद और पर्वत दो देवर्षि हैं, अश्विनी कुमार दो हैं, रथ के दो पहिए होते हैं और पति-पत्नी जीवन के दो सहयात्री हैं। इसके बाद बंदि ने तीन की संख्या को रेखांकित करते हुए कहा कि संसार का जन्म तीन प्रकार से होता है, तीनों वेद कर्म का प्रतिपादन करते हैं, तीनों कालों में यज्ञ होते हैं और तीन लोक तथा तीन ज्योतियां हैं। अष्टावक्र ने चार पर आते हुए कहा कि चार आश्रम, चार वर्ण, चार दिशाएं और वाणी के चार प्रकार (ओंकार, अकार, उकार और मकार) होते हैं। इसी प्रकार क्रम को आगे बढ़ाते हुए बंदि ने पांच यज्ञों, पांच अग्नियों, पांच इंद्रियों और पांच दिशाओं की अप्सराओं का वर्णन किया, तो अष्टावक्र ने छह ऋतुओं, छह इंद्रियों और छह साधकों के महत्व को प्रतिपादित किया। बंदि ने सात पालतू और सात जंगली पशुओं, सात छंदों और वीणा के सात तारों का उल्लेख किया, जिसके उत्तर में अष्टावक्र ने आठ वसुओं और यज्ञ के आठ स्तंभ कोणों की व्याख्या की। बंदि ने नौ प्रकार की प्रकृति और नौ अक्षरों के छंद की बात की, तो अष्टावक्र ने दस दिशाओं, दस दार्शनिकों और गर्भ के दस महीनों का वर्णन किया। बंदि ने ग्यारह रुद्रों और यज्ञ के ग्यारह स्तंभों का उल्लेख किया, जिसके प्रत्युत्तर में अष्टावक्र ने बारह आदित्यों, बारह दिनों के यज्ञ और वर्ष के बारह महीनों की महिमा गाई। अंततः जब बंदि ने तेरह की संख्या पर आकर कहा कि त्रयोदशी तिथि सर्वश्रेष्ठ है और पृथ्वी पर तेरह द्वीप हैं, इसके बाद वे श्लोक की अगली पंक्ति भूल गए और पूरी तरह मौन हो गए। इस पर अष्टावक्र ने तुरंत उस श्लोक को पूरा करते हुए कहा कि वेदों में तेरह अक्षरों वाले छंद को अतिछंद कहा जाता है और तेरह दिन के यज्ञ में अग्नि, वायु और सूर्य तीनों ही उपस्थित रहते हैं।

इस प्रकार शास्त्रार्थ में बंदि की पूर्ण पराजय हुई। अष्टावक्र ने न्याय की मांग करते हुए महाराज जनक से कहा कि चूंकि यह विद्वान हार चुका है, इसलिए पूर्व की शर्त के अनुसार इसे भी जल में डुबो दिया जाना चाहिए। तब बंदि ने अपने वास्तविक स्वरूप को प्रकट करते हुए कहा कि हे राजन, मैं वास्तव में वरुण देव का पुत्र हूँ और मैंने जितने भी ब्राह्मणों को शास्त्रार्थ में हराकर जल में भेजा था, वे सभी मेरे पिता के यज्ञ के लिए वहां गए थे; मैं उन सभी को अभी आपके समक्ष उपस्थित करता हूँ। बंदि के ऐसा कहते ही शास्त्रार्थ में हारे हुए ऋषि कहोड़ सहित सभी ब्राह्मण सकुशल महाराज जनक की सभा में वापस लौट आए। अपने पिता को जीवित देखकर अष्टावक्र ने अत्यंत श्रद्धापूर्वक उनके चरण स्पर्श किए। ऋषि कहोड़ अपने पुत्र की इस अद्वितीय विद्वता, साहस और पितृभक्ति को देखकर अत्यंत भावुक और प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने पूर्व में दिए शाप के निवारण हेतु अष्टावक्र से कहा कि पुत्र, तुम जाकर समीपता में बहने वाली समंगा नदी में स्नान करो, उस पवित्र नदी के प्रभाव से तुम मेरे शाप से मुक्त हो जाओगे। पिता की आज्ञा पाकर अष्टावक्र ने जब समंगा नदी में डुबकी लगाई, तो उनके शरीर के सभी आठों अंगों के टेढ़े-मेढ़े विकार पूरी तरह समाप्त हो गए और वे एक अत्यंत सुंदर और सुगठित काया वाले युवक बन गए।

महर्षि अष्टावक्र का जीवन और उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत सनातन दर्शन की वह अमूल्य धरोहर हैं, जो बाहरी आवरण और शारीरिक अक्षमताओं से परे जाकर आत्मा के शुद्ध स्वरूप को देखने का संदेश देते हैं। अष्टावक्र गीता के रूप में उन्होंने राजा जनक को जो आत्मज्ञान का उपदेश दिया, वह आज भी संसार के सर्वश्रेष्ठ दार्शनिक ग्रंथों में गिना जाता है, जिसमें उन्होंने यह सिद्ध किया कि मुक्ति किसी बाहरी कर्मकांड से नहीं बल्कि स्वयं के शुद्ध बुद्ध स्वरूप को जानने से मिलती है। पितृभक्ति, अटूट आत्मविश्वास और परम ज्ञान के समन्वय के रूप में महर्षि अष्टावक्र का चरित्र और उनका दिव्य अद्वैत दर्शन युगों-युगों तक मानव चेतना को जागृत करता रहेगा।

Pratahkal HQ

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