कौन थे ऋषभनाथ? मानव सभ्यता के प्रथम प्रणेता और जैन धर्म के आदि तीर्थंकर
आदिनाथ के नाम से प्रसिद्ध भगवान ऋषभनाथ ने भोग-भूमि से कर्म-भूमि का सूत्रपात किया और इक्ष्वाकु वंश की स्थापना कर मानव सभ्यता को कृषि व शिल्प की शिक्षा दी।

जैन ब्रह्मांड विज्ञान के अनुसार जब इस वर्तमान कालचक्र का आरंभ हुआ और मानवता अपनी शैशव अवस्था में थी, तब एक ऐसी महान आत्मा का अवतरण हुआ जिसने न केवल आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया, बल्कि आदि-पुरुष बनकर समाज के ढांचे की नींव भी रखी। भगवान ऋषभनाथ, जिन्हें आदिनाथ, ऋषभदेव और युगादिदेव जैसे नामों से पूजा जाता है, वर्तमान कालचक्र के प्रथम तीर्थंकर और इक्ष्वाकु वंश के संस्थापक थे। अयोध्या की पावन धरा पर राजा नाभि और रानी मरुदेवी के आंगन में जन्मे ऋषभनाथ का जीवन केवल एक शासक का नहीं, बल्कि एक युगदृष्टा का था जिन्होंने 'भोग-भूमि' से 'कर्म-भूमि' की ओर बढ़ते मानव समाज को जीवित रहने की कला सिखाई। उन्होंने ही समाज को उनकी दक्षताओं के आधार पर क्षत्रिय, आर्य और सूक्ष्म जैसे वर्गों में विभाजित किया और कृषि, लेखन, शिल्प, वाणिज्य, विद्या एवं तलवारबाजी जैसे छह मुख्य व्यवसायों का ज्ञान प्रदान किया, जिससे वे मानव सभ्यता के पितामह कहलाए। उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती के नाम पर ही इस देश का नाम 'भारतवर्ष' पड़ा और उनके दूसरे पुत्र बाहुबली अपनी त्याग और तपस्या के लिए विश्वविख्यात हुए।
ऋषभनाथ का सांसारिक जीवन वैभवपूर्ण था, लेकिन इन्द्र द्वारा आयोजित सभा में नृत्यांगना नीलांजना की अचानक मृत्यु ने उनके अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया। जीवन की क्षणभंगुरता का साक्षात अनुभव करते ही उन्होंने राजसी सुखों का त्याग कर संन्यास का मार्ग चुन लिया। संन्यास के बाद उनका तप अत्यंत कठिन रहा; जैन ग्रंथों के अनुसार उन्होंने बिना अन्न-जल ग्रहण किए 400 दिनों तक पदयात्रा की। उनके इस लंबे उपवास का अंत हस्तिनापुर के राजा श्रेयांस द्वारा दिए गए इक्षु-रस (गन्ने के रस) से हुआ, जिसे आज भी जैन समाज 'अक्षय तृतीया' के पावन पर्व के रूप में श्रद्धापूर्वक मनाता है। हज़ारों वर्षों की कठोर साधना के उपरांत, फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन उन्हें 'केवल ज्ञान' (सर्वज्ञता) की प्राप्ति हुई, जिसके बाद देवों ने उनके दिव्य उपदेशों के लिए समवशरण की रचना की। उन्होंने समाज को अहिंसा, सत्य और अपरिग्रह के सिद्धांतों से सींचा और एक ऐसे धार्मिक संघ की स्थापना की जिसने लाखों अनुयायियों को जन्म और मरण के चक्र से मुक्ति का मार्ग दिखाया।
भगवान ऋषभनाथ के जीवन का अंतिम पड़ाव कैलाश पर्वत (अष्टापद) पर पूर्ण हुआ, जहाँ उन्होंने निर्वाण प्राप्त कर मोक्ष की उच्चतम अवस्था को स्पर्श किया। उनकी विरासत आज भी अटूट है; ऋग्वेद और श्रीमद्भागवत महापुराण जैसे प्राचीन हिंदू ग्रंथों में भी उनका उल्लेख एक महान तपस्वी और विष्णु के अवतार के रूप में मिलता है। उनकी प्रतिमाएं, चाहे वह मांगी-तुंगी की 108 फीट ऊंची 'स्टैच्यू ऑफ अहिंसा' हो या ग्वालियर के गोपाचल पर्वत की विशाल नक्काशी, उनके प्रति अटूट श्रद्धा का प्रतीक हैं। शत्रुंजय की पहाड़ियों से लेकर रणकपुर और दिलवाड़ा के भव्य मंदिरों तक, ऋषभनाथ का व्यक्तित्व एक ऐसे पथ-प्रदर्शक का है जिसने आदि काल में धर्म की ज्योति जलाकर मानवता को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर किया। उनका जीवन संदेश देता है कि भौतिक ऐश्वर्य कितना भी विशाल क्यों न हो, वास्तविक शांति केवल आत्म-साधना और त्याग के मार्ग से ही संभव है।

