कौन थे रावत कृष्णदास चुंडावत? मेवाड़ के वो 'किंगमेकर' जिन्होंने महाराणा प्रताप को दिलाया उनका सिंहासन
सलूंबर के रावत कृष्णदास चुंडावत ने महाराणा प्रताप का राजतिलक कर मेवाड़ की रक्षा की और हल्दीघाटी युद्ध में सेना के अग्रिम दस्ते 'हरावल' का नेतृत्व किया।

भारतीय इतिहास के पन्नों में मेवाड़ का गौरवशाली अध्याय केवल महाराणाओं के बलिदान से ही नहीं, बल्कि उन निष्ठावान सामंतों के शौर्य से भी लिखा गया है जिन्होंने मातृभूमि के लिए अपने प्राणों और अधिकारों को सर्वोपरि रखा। इसी कड़ी में रावत कृष्णदास चुंडावत एक ऐसा नाम है, जो 16वीं शताब्दी के दौरान मेवाड़ राज्य के सबसे प्रभावशाली और शक्तिशाली व्यक्तित्व के रूप में उभरे। सलूंबर के रावत के रूप में वह मेवाड़ के सरदारों में सर्वोच्च स्थान रखते थे और उनकी भूमिका केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं थी, बल्कि राज्य की राजनीतिक स्थिरता और उत्तराधिकार के निर्णयों में भी उनका शब्द अंतिम माना जाता था। मेवाड़ की सैन्य परंपरा के अनुसार, चुंडावत वंश को 'हरावल' यानी सेना की अग्रिम पंक्ति का नेतृत्व करने का वंशानुगत अधिकार प्राप्त था, और कृष्णदास ने इस गौरवशाली परंपरा का निर्वहन करते हुए सबसे कठिन मोर्चों पर दुश्मन का सामना किया। उनके जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ वर्ष 1572 में महाराणा उदय सिंह द्वितीय के निधन के बाद आया, जब राज्य एक गहरे उत्तराधिकार संकट से जूझ रहा था। उदय सिंह ने अपनी प्रिय रानी के प्रभाव में आकर छोटे पुत्र जगमाल सिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था, लेकिन कृष्णदास चुंडावत ने भांप लिया था कि मुगलों के बढ़ते खतरे के बीच मेवाड़ को एक अत्यंत साहसी और योग्य नेतृत्व की आवश्यकता है। अपनी पारंपरिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए उन्होंने निर्भीकतापूर्वक हस्तक्षेप किया और अन्य सरदारों के सहयोग से जगमाल को सिंहासन से हटाकर महाराणा प्रताप का राजतिलक किया। यह उनका दूरदर्शी निर्णय ही था जिसने मेवाड़ को एक ऐसा नायक दिया जिसने अकबर की विशाल सेना के सामने कभी घुटने नहीं टेके। 18 जून 1576 को जब हल्दीघाटी के मैदान में रणभेरी बजी, तब रावत कृष्णदास चुंडावत ने अपने अधिकारानुसार हरावल दस्ते का नेतृत्व किया और मुगल सेनापति मान सिंह प्रथम की फौज के खिलाफ भीषण प्रहार किया। उनकी रणनीतिक कुशलता और वीरता ने राजपूत सैनिकों का मनोबल बढ़ाए रखा और वह युद्ध के अंत तक महाराणा प्रताप के साथ एक मजबूत ढाल बनकर खड़े रहे। सलूंबर के रावत होने के नाते उनके पास यह विशेष अधिकार भी था कि मेवाड़ के किसी भी राजकीय दस्तावेज या भूमि अनुदान पर उनकी सहमति अनिवार्य थी, और उन्हीं के द्वारा नए महाराणा का राजतिलक किया जाता था। अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं से ऊपर उठकर राज्य की भलाई को प्राथमिकता देने वाले कृष्णदास चुंडावत आज भी त्याग और अटूट निष्ठा के प्रतीक माने जाते हैं, जिनकी विरासत के बिना महाराणा प्रताप का संघर्ष और मेवाड़ का इतिहास अधूरा है।

