कौन थे रावल जैसल? मरुभूमि के वो प्रतापी संस्थापक जिन्होंने रेत के समंदर में स्वर्ण नगरी की नींव रखी।
12वीं शताब्दी में भाटी राजपूत शासक रावल जैसल ने त्रिकुटा पहाड़ी पर जैसलमेर किले की नींव रखी और लोद्रवा के स्थान पर नई राजधानी स्थापित की।

राजस्थान के धोरों में छिपी वीरता और संघर्ष की गाथाएं आज भी हवाओं में गूंजती हैं, जिनमें जैसलमेर के संस्थापक महारावल जैसल सिंह का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।
भाटी राजपूतों की गौरवशाली वंशावली में रावल देवराज भाटी की छठी पीढ़ी में जन्मे रावल जैसल, देवराज (देवरावल) के शासक रावल दूसाज के ज्येष्ठ पुत्र थे। 12वीं शताब्दी के उस दौर में जब सत्ता और उत्तराधिकार के संघर्ष चरम पर थे, उनके जीवन में एक बड़ा मोड़ तब आया जब उनके पिता ने उनके छोटे भाई विजयराज लांझा को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। विजयराज ने न केवल सिंहासन पर अधिकार कर लिया, बल्कि जैसल को राज्य से निर्वासित भी कर दिया। इस निर्वासन ने ही एक नए साम्राज्य के उदय की पटकथा लिखी। अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा और एक सुरक्षित राजधानी की तलाश में रावल जैसल ने मरुस्थल की खाक छानी और अंततः उनकी दृष्टि त्रिकुटा पहाड़ी पर ठहरी। रेत के अंतहीन विस्तार के बीच 75 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह विशाल त्रिकोणीय चट्टान सुरक्षा की दृष्टि से अभेद्य थी। इसी स्थान पर उनकी भेंट ईसुल नामक एक ऋषि से हुई, जो वहां प्रवास कर रहे थे और उनकी भविष्यवाणियों तथा उस स्थान की दिव्यता से प्रभावित होकर रावल जैसल ने अपनी राजधानी को लोद्रवा से स्थानांतरित करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। वर्ष 1156 में उन्होंने इसी पहाड़ी पर एक मिट्टी के किले की नींव रखी और अपने नाम पर इसे 'जैसलमेर' का नाम दिया। सन् 1153 से 1168 तक के अपने शासनकाल के दौरान उन्होंने न केवल एक अभेद्य दुर्ग का निर्माण कराया, बल्कि भाटी राजवंश को एक ऐसी पहचान दी जो सदियों तक थार मरुस्थल की प्रहरी बनी रही। रावल जैसल का यह साहस और दूरदर्शिता ही थी जिसने एक बंजर पहाड़ी को विश्व प्रसिद्ध स्वर्ण नगरी में बदल दिया, जिसका ऐतिहासिक महत्व और स्थापत्य आज भी भारतीय इतिहास में उनके अमिट प्रभाव की गवाही देता है।

