कौन थीं रतन शास्त्री? महिला शिक्षा और स्वावलंबन के लिए समर्पित एक युगदृष्टा का गौरवशाली इतिहास
राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री की पत्नी और महिला शिक्षा की प्रणेता रतन शास्त्री का संघर्ष, उपलब्धियां और स्वतंत्रता संग्राम में योगदान।

राजस्थान की वीर प्रसूता भूमि ने अनेक ऐसी विभूतियों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपनी दूरदर्शिता और संघर्ष से समाज को नई दिशा प्रदान की, जिनमें पद्म विभूषण रतन शास्त्री का नाम महिला सशक्तिकरण और शिक्षा के क्षेत्र में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। 5 अक्टूबर 1912 को मध्य प्रदेश के रतलाम में जन्मीं रतन शास्त्री, जिन्हें प्यार से 'रतन देवी' भी कहा जाता था, का प्रारंभिक जीवन रतलाम की कन्या पाठशाला में शिक्षा ग्रहण करते हुए बीता। वर्ष 1924 में उनका विवाह हीरालाल शास्त्री के साथ हुआ, जो बाद में राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री बने। हीरालाल शास्त्री एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए जयपुर रियासत के प्रतिष्ठित सरकारी पद का त्याग कर दिया था, और इस कठिन निर्णय में रतन शास्त्री व उनके मायके पक्ष ने उनका पूर्ण सहयोग किया। गांधीवादी आदर्शों के प्रति अटूट निष्ठा रखने वाली रतन शास्त्री ने एक संपन्न परिवार से होने के बावजूद सादगी और मितव्ययिता को अपनाया और जीवन भर मोटे खादी के वस्त्र ही धारण किए। राष्ट्रभक्ति का आलम यह था कि उन्होंने न केवल स्वयं खादी पहनी बल्कि अपने बच्चों को भी इसी संस्कार में ढाला और भारतीय समाज की प्रचलित मान्यताओं के विपरीत अपने समस्त आभूषण बेच दिए, यहाँ तक कि सुहाग की निशानी मानी जाने वाली नाक की लौंग तक का त्याग कर राष्ट्र सेवा में समर्पित कर दिया।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उन्होंने जयपुर राज्य के प्रजामंडल आंदोलन में एक मजबूत स्तंभ की भूमिका निभाई और जब 1939 में राज्य ने कई प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया, तब रतन शास्त्री ने नेतृत्व की कमान संभालते हुए सत्याग्रहियों को संगठित और प्रेरित किया। उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ उनकी पुत्री शांताबाई का आकस्मिक निधन था, जिसके बाद उनकी स्मृति में उन्होंने 6 अक्टूबर 1935 को 'श्री शांताबाई शिक्षा कुटीर' की स्थापना की। यही छोटा सा संस्थान आगे चलकर राजस्थान बालिका विद्यालय और अंततः 1943 में 'वनस्थली विद्यापीठ' के रूप में विकसित हुआ, जिसे 1983 में विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त हुआ। रतन शास्त्री ने न केवल ईंट-पत्थरों से एक संस्थान खड़ा किया, बल्कि उन्होंने भावी पीढ़ी में राष्ट्रवाद, सक्रियता और देशभक्ति के मूल्य आरोपित किए, जहाँ से कमला स्वाधीन और गीता बजाज जैसी प्रमुख महिला कार्यकर्ता शिक्षित होकर निकलीं। उनके इसी अद्वितीय योगदान के लिए उन्हें 1955 में पद्म श्री, 1975 में पद्म भूषण और 1990 में महिलाओं व बच्चों के कल्याण के लिए जमनालाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 1998 में 86 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ, लेकिन 'भाभुजी' के रूप में वे आज भी वनस्थली की छात्राओं और महिला शिक्षा के समर्थकों के लिए एक शाश्वत प्रेरणा स्रोत बनी हुई हैं, जिनका संपूर्ण जीवन त्याग, सेवा और शिक्षा के प्रति अटूट समर्पण की एक अमर गाथा है।

