कौन थे राव सीहा? मारवाड़ के राठौड़ साम्राज्य की नींव रखने वाले महान संस्थापक
कन्नौज के पतन के बाद राव सीहा ने 13वीं शताब्दी में मारवाड़ में राठौड़ शासन की स्थापना की और हिंदू संस्कृति की रक्षा के लिए तुर्क आक्रमणकारियों से संघर्ष किया।

राठौड़ राजवंश का इतिहास भारत के सबसे प्रतापी और साहसी साम्राज्यों में गिना जाता है, जिसकी जड़ें सूर्यवंश से जुड़ी मानी जाती हैं। इस महान वंश की नींव रखने वाले राव सीहा सेतरामोट का जीवन त्याग, वीरता और राजनीतिक दूरदर्शिता का एक अद्भुत मिश्रण था। वे कन्नौज के अंतिम गहड़वाल शासक जयचंद्र के पौत्र थे। जब कन्नौज का साम्राज्य संकटों से घिर गया, तब उनके पिता सेतराम ने सांसारिक मोह त्याग कर संन्यास का मार्ग अपनाया, परंतु नियति ने राव सीहा के लिए एक अलग ही मार्ग प्रशस्त कर रखा था। अपने पूर्वजों की विरासत को अक्षुण्ण रखने के संकल्प के साथ वे उत्तर भारत से पश्चिम की ओर निकले। इस प्रवास के दौरान वे गुजरात के एक स्थानीय शासक की सहायता करते हुए उनके पारिवारिक संबंधों में बंधे और अपनी सैन्य शक्ति को संगठित किया। 13वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में, राव सीहा मारवाड़ के पाली क्षेत्र में पहुँचे, जहाँ स्थानीय ब्राह्मणों को 'कान्हा मेर' नामक एक अत्याचारी राजा प्रताड़ित कर रहा था। राव सीहा ने न केवल उस आततायी को परास्त किया, बल्कि वहां के निवासियों को सुरक्षा का वचन देकर राठौड़ राजनीति के पहले बीज बोए। 1226 ईस्वी में उन्होंने विधिवत रूप से मारवाड़ में राठौड़ शासन की स्थापना की। उनका संघर्ष केवल सत्ता के लिए नहीं, बल्कि तुर्क आक्रमणकारियों के बढ़ते प्रभाव के बीच हिंदू धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए भी था। बिट्ठू शिलालेख के ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार, राव सीहा ने 1273 ईस्वी में अपनी अंतिम सांस लेने तक मारवाड़ की सीमाओं की रक्षा की। उनका जीवन एक खानाबदोश योद्धा से एक प्रतिष्ठित शासक बनने की यात्रा थी, जिसने आगे चलकर जोधपुर, बीकानेर और किशनगढ़ जैसी शक्तिशाली रियासतों का आधार तैयार किया। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में जिस राठौड़ सत्ता को जन्म दिया, उसने सदियों तक राजस्थान की धरती पर मुगलों और अंग्रेजों को कड़ी चुनौती दी।
राव सीहा का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने बिखरते हुए राठौड़ कबीलों को एक सूत्र में पिरोकर उन्हें एक राजनीतिक पहचान दी। उनके द्वारा स्थापित 'जोधावत' और बाद में विकसित हुई अन्य शाखाओं ने भारत के इतिहास में अमिट छाप छोड़ी। आज भी राव सीहा को मारवाड़ के उद्धारक और एक ऐसे लोकदेवता के समान सम्मान प्राप्त है, जिन्होंने शून्य से एक महान साम्राज्य का सृजन किया। उनका बलिदान और पराक्रम आधुनिक राठौड़ वंश के लिए आज भी गौरव का सर्वोच्च शिखर बना हुआ है।

