हिंदुस्तान के सबसे शक्तिशाली सम्राट माने जाने वाले राव मालदेव राठौर ने अपनी वीरता और कूटनीति से मारवाड़ को एक साम्राज्य में बदल दिया था।

राजस्थान के इतिहास में राव मालदेव राठौर एक ऐसे प्रकाशपुंज की तरह उभरते हैं, जिन्होंने अपनी तलवार के दम पर मारवाड़ की सीमाओं को दिल्ली के द्वार तक पहुँचा दिया था। 5 दिसंबर 1511 को राव गंगा और रानी पद्मा कुमारी के घर जन्मे मालदेव ने बचपन से ही युद्ध कौशल और नेतृत्व के गुण प्रदर्शित किए। 1532 में जब उन्होंने सिंहासन संभाला, तब मारवाड़ एक छोटी सी रियासत थी, लेकिन उनकी आँखों में एक विशाल साम्राज्य का स्वप्न था। शासन की बागडोर संभालने से पहले ही वे अपने पिता के साथ कई अभियानों में अपनी साख जमा चुके थे, जिसमें 1527 के खानवा युद्ध का उल्लेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। उस ऐतिहासिक युद्ध में उन्होंने न केवल अदम्य साहस दिखाया, बल्कि राजपूत संघ की पराजय के बाद घायल राणा सांगा को सुरक्षित युद्धक्षेत्र से बाहर निकालकर अपनी निष्ठा और वीरता का परिचय दिया।

मालदेव का शासनकाल मारवाड़ के अभूतपूर्व विस्तार का साक्षी बना। उन्होंने एक-एक कर अपने पड़ोसी नौ राठौर सरदारों पर विजय प्राप्त की और मारवाड़ की बिखरी हुई शक्ति को एक सूत्र में पिरोया। उनके नेतृत्व में मारवाड़ की सेना ने नागौर, अजमेर, मेड़ता, जालौर और जैसलमेर जैसे रणनीतिक क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। मालदेव की योग्यता का लोहा उस समय के फारसी इतिहासकार भी मानते थे; 'तबकात-ए-अकबरी' और 'तारीख-ए-फिरिश्ता' जैसे ग्रंथों में उन्हें 'हिंदुस्तान का सबसे शक्तिशाली शासक' वर्णित किया गया है। उनके साम्राज्य की सीमाएं उत्तर में दिल्ली के निकट झज्जर तक और दक्षिण-पश्चिम में गुजरात और सिंध के कुछ हिस्सों तक फैल गई थीं। इस विस्तारवादी युग में उन्होंने न केवल क्षेत्रों को जीता, बल्कि वहां हिंदू शासन की पुनर्स्थापना करते हुए जजिया कर को समाप्त किया, जो उनकी धार्मिक और प्रशासनिक दूरदर्शिता का प्रमाण था।

राव मालदेव की सैन्य शक्ति का मुख्य आधार उनकी विशाल और नियमित घुड़सवार सेना 'चिंधार' थी। उन्होंने अपने सैनिकों को बेहतरीन घोड़े और संसाधन उपलब्ध कराए, जिससे वे युद्धभूमि में अपराजेय बन गए। हालांकि, उनके जीवन में संघर्षों की भी कमी नहीं रही। शेर शाह सूरी और मुगल सम्राट हुमायूँ के बीच चल रहे संघर्ष के दौरान उन्होंने अपनी स्वतंत्र सत्ता बनाए रखी। जब हुमायूँ ने हार के बाद उनसे सहायता मांगी, तो मालदेव ने उन्हें शरण देने का प्रस्ताव दिया, लेकिन परिस्थितियों और सांस्कृतिक मतभेदों के कारण यह गठबंधन सफल नहीं हो सका। शेर शाह सूरी के साथ हुआ 'सम्मेल का युद्ध' मालदेव के इतिहास का सबसे निर्णायक मोड़ था। यद्यपि शेर शाह ने कूटनीतिक षड्यंत्र और जाली पत्रों के माध्यम से मालदेव को भ्रमित कर दिया, लेकिन उनके वीर सेनापतियों जैता और कुम्पा ने मुट्ठी भर सैनिकों के साथ अफगान सेना के दांत खट्टे कर दिए। इस युद्ध की भयंकता देख शेर शाह के मुंह से निकला वह वाक्य— "मैंने मुट्ठी भर बाजरे के लिए दिल्ली की सल्तनत खो दी होती"—आज भी राजपूत शौर्य की अमर गाथा सुनाता है।

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में मालदेव ने मेवाड़ और आमेर जैसी रियासतों के साथ जटिल राजनीतिक संबंध निभाए। उन्होंने हरमोदा के युद्ध में विजय प्राप्त की और कछवाहा शासकों को अपना सामंत बनने पर मजबूर कर दिया। अकबर के शासनकाल के दौरान भी उन्होंने मुगलों के निरंतर आक्रमणों का डटकर सामना किया और मारवाड़ के मुख्य दुर्गों को सुरक्षित रखा। 7 नवंबर 1562 को उनके निधन तक मारवाड़ एक सशक्त और स्वाभिमानी राज्य के रूप में स्थापित हो चुका था। राव मालदेव राठौर का व्यक्तित्व एक ऐसे योद्धा का था जिसने कभी झुकना नहीं सीखा। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सीमित संसाधनों के बावजूद यदि संकल्प दृढ़ हो, तो एक छोटी सी रियासत भी महाशक्तियों के सामने सीना तानकर खड़ी हो सकती है। आज भी उन्हें मारवाड़ के उद्धारक और मध्यकालीन भारत के महानतम हिंदू सम्राटों में से एक के रूप में बड़े गर्व के साथ याद किया जाता है।

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