कौन थे राव लूणकरण? बीकानेर के वो प्रतापी शासक जिन्होंने रेगिस्तान की सीमाओं को विस्तार देकर राठौड़ साम्राज्य को एक नई शक्ति दी।
बीकानेर के संस्थापक राव बीका के पुत्र लूणकरण ने राज्य का विस्तार किया और 1526 में ढोसी के युद्ध में वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की।

मध्यकालीन राजपूताना के इतिहास में बीकानेर रियासत के सुदृढ़ीकरण और विस्तार का श्रेय जिस महान शासक को जाता है, वे थे राव लूणकरण। 12 जनवरी 1470 को जन्मे लूणकरण बीकानेर के संस्थापक राव बीका और पुगल के भाटी शासक राव शेखा की पुत्री रानी रंग कंवर के कनिष्ठ पुत्र थे। अपने बड़े भाई राव नरो सिंह के निःसंतान निधन के पश्चात जनवरी 1505 में 35 वर्ष की आयु में लूणकरण ने सत्ता की बागडोर संभाली। उनका सिंहासनारोहण एक ऐसी चुनौती के साथ हुआ जहाँ राव बीका द्वारा विजित भूमि पर सामंत विद्रोह कर रहे थे, जिन्हें लूणकरण ने अत्यंत कुशलता से शांत कर राज्य में व्यवस्था स्थापित की। उनका दो दशक लंबा शासनकाल निरंतर सैन्य अभियानों और क्षेत्रीय विस्तार का गवाह बना। उन्होंने 1509 में ददरेवा के चौहान शासक मान सिंह को सात महीने की घेराबंदी के बाद पराजित कर उनके क्षेत्रों को अपने अधीन किया। इसके बाद 1512 में उन्होंने फतेहपुर के कायमखानी शासक दौलत खान की आंतरिक कलह का लाभ उठाते हुए 120 गांवों पर विजय प्राप्त की। उनकी वीरता यहीं नहीं थमी, उन्होंने नागौर के खानजादा शासकों को धूल चटाई और हिसार एवं सिरसा के पास के विशाल क्षेत्रों को विजित कर बीकानेर की सीमाओं को अभूतपूर्व विस्तार दिया।
राव लूणकरण की वीरता और स्वाभिमान का सबसे रोचक प्रसंग जैसलमेर के रावल जैत सिंह के साथ उनका टकराव है। कहा जाता है कि रावल जैत सिंह द्वारा राठौड़ वंश के प्रति किए गए अपमानजनक कटाक्ष ने लूणकरण को युद्ध के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अपनी घुड़सवार सेना के साथ जैसलमेर पर धावा बोल दिया और दुर्ग की घेराबंदी कर रावल जैत सिंह को बंदी बना लिया। यह उनकी कूटनीतिक जीत थी कि उन्होंने जैत सिंह को अपनी पुत्री का विवाह अपने पुत्र से करने के वचन पर मुक्त किया। राव लूणकरण का जीवन जितना शौर्यपूर्ण था, उनका अंत भी उतना ही वीरतापूर्ण रहा। मार्च 1526 में नारनौल के नवाब के विरुद्ध ढोसी की लड़ाई में अपने चार पुत्रों के साथ वे रणभूमि में उतरे। अपनों के विश्वासघात और पीछे हटने के बावजूद लूणकरण अंत तक डटे रहे और युद्ध भूमि में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनके बलिदान के बाद उनके दूसरे पुत्र राव जैत सिंह ने शासन संभाला, जबकि युद्ध में जीवित बचे उनके ज्येष्ठ पुत्र रतन सिंह ने महाजन की जागीर स्वीकार कर 'महाराज' की पदवी धारण की और 'रतनसिंहोत' उप-शाखा की नींव रखी। आज भी बीकानेर की 'बीका जी की टेकरी' में उनकी छतरी उनके अदम्य साहस और राजपूती आन-बान-शान की अमर गाथा सुनाती है।

