मारवाड़ की वीर धरा पर अपने पुरुषार्थ से एक नए युग का सूत्रपात करने वाले राव जोधा इतिहास के उन विरले योद्धाओं में से एक हैं, जिन्होंने शून्य से शिखर तक का सफर अपनी तलवार और दूरदर्शिता के बल पर तय किया। 28 मार्च 1416 को जन्मे राव जोधा राठौड़ वंश के 15वें शासक थे और उनके जीवन की कहानी अदम्य साहस, निरंतर संघर्ष और पितृभूमि के प्रति अटूट निष्ठा का एक जीवंत दस्तावेज़ है। राव रणमल के ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते जोधा का राजनीतिक भविष्य जितना उज्ज्वल दिख रहा था, परिस्थितियां उतनी ही चुनौतीपूर्ण हो गईं जब मेवाड़ के दरबार में चल रही साजिशों के कारण 1438 ईस्वी में उनके पिता की सोते समय निर्मम हत्या कर दी गई। इस घटना ने जोधा के जीवन को पूरी तरह बदल दिया और रावत चूड़ा के नेतृत्व में मेवाड़ की सेनाओं ने उनके पैतृक राज्य मंडोर पर अधिकार कर लिया, जिसके बाद जोधा को दर-दर की ठोकरें खानी पड़ीं।

अपने पैतृक राज्य को खोने के बावजूद जोधा ने कभी हार नहीं मानी, क्योंकि उनका दृढ़ विश्वास था कि धरती केवल वीरों की वधु होती है और युद्ध ही क्षत्रिय का वास्तविक धर्म है। लगभग 15 वर्षों के लंबे और कठिन संघर्ष के बाद, अपने भाइयों के सक्रिय सहयोग और अटूट वीरता के बल पर उन्होंने अंततः वि.सं. 1510 में मंडोर, कोसना और चौकड़ी पर विजय ध्वज लहराकर मारवाड़ को मेवाड़ के प्रभाव से मुक्त कराया। यह विजय केवल एक राज्य की प्राप्ति नहीं थी, बल्कि राठौड़ वंश के पुनरुद्धार का उद्घोष था। इस सफलता के बाद जोधा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और सोजत, पाली, खैरवा, नाडोल, मेड़ता, फलोदी, सिवाना और नागौर जैसे विशाल क्षेत्रों को जीतकर एक सुदृढ़ और विस्तृत राठौड़ साम्राज्य की स्थापना की। उनके शासनकाल की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि 1459 ईस्वी में जोधपुर नगर की स्थापना और चिड़ियाटूँक पहाड़ी पर अजेय मेहरानगढ़ दुर्ग की नींव रखना रही, जिसे उन्होंने मंडोर की तुलना में अधिक सुरक्षित और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण मानकर अपनी राजधानी बनाया।

राव जोधा ने न केवल युद्ध के मैदान में अपनी योग्यता सिद्ध की, बल्कि एक कुशल प्रशासक के रूप में अपने राज्य को व्यवस्थित करने के लिए शासन को विभिन्न भागों में विभाजित कर अपने भाइयों और पुत्रों को जिम्मेदारी सौंपी। उनकी दूरदर्शिता का ही परिणाम था कि उनके पुत्र राव बीका ने बीकानेर और दूदोजी ने मेड़ता जैसे स्वतंत्र राठौड़ राज्यों की स्थापना की, जिससे राठौड़ सत्ता का विस्तार सुदूर क्षेत्रों तक हुआ। उनके व्यक्तिगत जीवन में उनकी रानी जसमादे का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा, जिन्होंने जोधपुर में रानीसर झील का निर्माण करवाकर जनकल्याण का उदाहरण प्रस्तुत किया। 6 अप्रैल 1489 को उनके निधन तक, राव जोधा ने मारवाड़ को एक ऐसी राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान दे दी थी, जो आने वाली शताब्दियों तक राजस्थान के गौरव का प्रतीक बनी रही। उनका व्यक्तित्व एक ऐसे मार्गदर्शक का है जिसने बिखरी हुई शक्तियों को समेटकर एक अखंड साम्राज्य का निर्माण किया और मरुधरा के इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित कर दिया।

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