मध्यकालीन भारत के इतिहास में राजपूताना की वीरता और निष्ठा की गाथाएँ स्वर्णाक्षरों में अंकित हैं, जिनमें बूंदी रियासत के हाड़ा चौहान शासकों का स्थान अत्यंत विशिष्ट रहा है। बूंदी की इस गौरवशाली परंपरा में राव छत्तर साल सिंह (1632–1658) एक ऐसा नाम बनकर उभरे, जिन्होंने न केवल अपनी तलवार के दम पर युद्धक्षेत्र में लोहा मनवाया, बल्कि मुगल दरबार में अपनी अडिग निष्ठा और प्रशासनिक दक्षता से एक अद्वितीय पहचान बनाई। राव देवा द्वारा 1241 में स्थापित इस राज्य ने सदियों तक मेवाड़ के सिसोदिया शासकों के अधीन रहकर शासन किया, लेकिन 1569 में सम्राट अकबर द्वारा राव सुरजन सिंह को 'राव राजा' की उपाधि देने के बाद बूंदी का कद मुगल साम्राज्य में निरंतर बढ़ता गया। इसी वंश परंपरा को आगे बढ़ाते हुए राव छत्तर साल अपने दादा राव रतन सिंह के उत्तराधिकारी बने, क्योंकि उनके पिता गोपीनाथ का निधन रतन सिंह के शासनकाल में ही हो गया था। राव छत्तर साल के व्यक्तित्व में एक कुशल योद्धा और एक दूरदर्शी निर्माता का अद्भुत संगम था; उन्होंने जहाँ एक ओर केशवरायपाटन में प्रसिद्ध केशव राय मंदिर और बूंदी में भव्य छत्र महल का निर्माण करवाकर स्थापत्य कला को समृद्ध किया, वहीं दूसरी ओर मुगल सेना के एक अभिन्न अंग के रूप में शाहजहाँ के शासनकाल में अपनी सैन्य प्रतिभा का प्रदर्शन किया। उनकी योग्यता और विश्वसनीयता का प्रमाण इसी तथ्य से मिलता है कि मुगल शहजादे दारा शिकोह ने उन्हें दिल्ली की सूबेदारी जैसा महत्वपूर्ण और दुर्लभ उत्तरदायित्व सौंपा था, जो उस दौर में किसी हिंदू राजा के लिए बहुत बड़ा सम्मान माना जाता था। राव छत्तर साल की निष्ठा केवल सुख के दिनों तक सीमित नहीं थी; जब औरंगजेब ने अपने पिता और भाई के विरुद्ध विद्रोह किया, तब औरंगजेब द्वारा दिए गए प्रलोभनों और दी गई धमकियों के बावजूद वे शाहजहाँ और दारा शिकोह के प्रति अपने वचन पर अडिग रहे। उनके जीवन का चरमोत्कर्ष 1658 में सामूगढ़ के युद्ध में देखने को मिला, जहाँ वे अपने सबसे छोटे पुत्र भरत सिंह के साथ हाड़ा राजपूत सैनिकों का नेतृत्व करते हुए वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनके बलिदान ने हाड़ा वंश को वह सम्मान दिलाया जिसे बाद के शासकों, जैसे राव भाव सिंह और महाराव राजा बुध सिंह ने और आगे बढ़ाया। राव छत्तर साल की विरासत केवल युद्धों तक सीमित नहीं रही, बल्कि उनके द्वारा स्थापित मूल्यों ने ही आगे चलकर राव राजा बिशन सिंह को अंग्रेजों के साथ सहायक संधि करने और महाराव राजा राम सिंह को प्रशासनिक व शैक्षिक सुधारों के माध्यम से बूंदी को एक आधुनिक पहचान देने की प्रेरणा दी। राव छत्तर साल हाड़ा चौहानों के उस स्वाभिमान के प्रतीक हैं, जिसने सत्ता के लालच के ऊपर स्वामीभक्ति और धर्म को प्राथमिकता दी, और यही कारण है कि आज भी राजस्थान के इतिहास में उनका नाम एक न्यायप्रिय, कला प्रेमी और अजेय योद्धा के रूप में सम्मान के साथ लिया जाता है।

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