इतिहास के पन्नों में कुछ संकल्प ऐसे होते हैं जो महज एक परिहास से जन्म लेते हैं, लेकिन उनकी परिणति एक साम्राज्य के उदय के रूप में होती है। मारवाड़ के संस्थापक राव जोधा के पांचवें पुत्र राव बीका की जीवन यात्रा भी कुछ ऐसी ही साहस और स्वाभिमान की अनूठी मिसाल है। 5 अगस्त 1438 को जन्मे राव बीका राठौड़ वंश के एक तेजस्वी वंशज थे, जिनके भीतर अपनी स्वतंत्र पहचान स्थापित करने की तीव्र उत्कंठा थी। उनके जीवन का निर्णायक मोड़ तब आया जब एक बार दरबार में अपने चाचा रावत कांधल के साथ कानाफूसी करते हुए उन्हें देखकर राव जोधा ने व्यंग्य में कह दिया कि शायद वे किसी नए क्षेत्र को जीतने की योजना बना रहे हैं। इस टिप्पणी को राव बीका ने एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया और अपने पिता के आशीर्वाद से नए राज्य की स्थापना का दृढ़ निश्चय कर लिया। 30 सितंबर 1465 को मात्र 27 वर्ष की आयु में राव बीका ने 100 घुड़सवारों और 500 पैदल सैनिकों की एक छोटी सी टुकड़ी के साथ जोधपुर का त्याग कर दिया। उनके इस साहसी अभियान में उनके चाचा रावत कांधल, जो उन्हें मारवाड़ की तर्ज पर स्थापित करने के लिए संकल्पित थे, उनके भाई बीदा, जोगायत और धाय भाई चाहड़ गहलोत सहित कई विश्वसनीय योद्धा साथ थे। उन्होंने जांगलदेश की ओर रुख किया, जो उस समय अशांत और राजनीतिक रूप से अस्थिर था। करणी माता के आशीर्वाद और गोदारा जाटों व चारणों के सहयोग से राव बीका ने इस दुर्गम क्षेत्र में अपनी सैन्य कुशलता का परिचय देते हुए भाटी, जाट और जोहिया जैसे स्थानीय समुदायों पर विजय प्राप्त की। उन्होंने न केवल बीकानेर शहर की नींव रखी, बल्कि देखते ही देखते सिरसा, लाडनूं, भटनेर, बठिंडा, सिंघाना, रीणी, नोहर और पूगल जैसे विस्तृत क्षेत्रों को अपने साम्राज्य में मिला लिया। उनके शासनकाल में बीकानेर राज्य का विस्तार लगभग 40,000 वर्ग मील तक फैल गया था, जिसमें 3,000 से अधिक गाँव शामिल थे। 17 जून 1504 को अपनी मृत्यु तक राव बीका ने बीका राठौड़ शाखा और बीकावत राठौड़ घराने को भारतीय इतिहास में एक अमिट स्थान दिला दिया था। उनके बाद उनके पुत्र राव नारा और तत्पश्चात राव लूणकरण ने इस विरासत को आगे बढ़ाया, लेकिन मरुस्थल की तपती रेत पर शौर्य की जो गाथा राव बीका ने लिखी थी, वह आज भी बीकानेर की रगों में गौरव बनकर दौड़ती है। राव बीका का व्यक्तित्व एक ऐसे दूरदर्शी निर्माता का है जिसने शून्य से शिखर तक का सफर अपनी तलवार और संकल्प के बल पर तय किया और राजस्थान के सांस्कृतिक व राजनीतिक मानचित्र पर बीकानेर को एक अपराजेय शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया।

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