अपनी मातृभूमि की रक्षा और स्वाभिमान को जीवित रखने के लिए हंसते-हंसते अग्नि को गले लगाने वाली मेवाड़ की राजमाता रानी कर्णावती का बलिदान भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है।

बूंदी के शासक हाड़ा नरबद की पुत्री कर्णावती का विवाह मेवाड़ के प्रतापी महाराणा सांगा के साथ हुआ था, जिसके बाद वे न केवल मेवाड़ की महारानी बनीं बल्कि अल्प समय के लिए उन्होंने बूंदी के शासन की बागडोर भी संभाली। उनका जीवन अटूट साहस और कूटनीतिक सूझबूझ का संगम था, जो विशेष रूप से महाराणा सांगा के निधन के बाद उभरा जब मेवाड़ राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा था। राणा विक्रमादित्य और राणा उदय सिंह की माता तथा महान योद्धा महाराणा प्रताप की दादी के रूप में उनका व्यक्तित्व राजपूती परंपराओं और संस्कारों का केंद्र रहा। उनके जीवन का सबसे कठिन और ऐतिहासिक मोड़ तब आया जब गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया। उस समय राज्य की आंतरिक स्थिति चुनौतीपूर्ण थी, लेकिन रानी कर्णावती ने हार मानने के बजाय एक कुशल संरक्षिका की भूमिका निभाई और शत्रुओं का डटकर मुकाबला किया। जब विजय की संभावनाएं क्षीण होने लगीं और दुर्ग की रक्षा असंभव जान पड़ी, तब उन्होंने आत्मसमर्पण के बजाय अपने मान-मर्यादा की रक्षा को सर्वोपरि रखा। 8 मार्च 1534 को रानी कर्णावती ने हजारों अन्य राजपूत महिलाओं के साथ जलती हुई ज्वाला में कूदकर जौहर किया, जो मेवाड़ का दूसरा महान जौहर कहलाया। यह केवल एक मृत्यु नहीं थी, बल्कि विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध एक मौन और शक्तिशाली विद्रोह था जिसने आने वाली पीढ़ियों के लिए वीरता का एक नया मानक स्थापित किया। रानी कर्णावती का यह बलिदान चित्तौड़गढ़ की मिट्टी में आज भी सुगंध बनकर रचा-बसा है, जो बताता है कि मेवाड़ की धरती ने केवल शूरवीर योद्धा ही नहीं, बल्कि ऐसी साहसी वीरांगनाएं भी पैदा की हैं जिन्होंने अपने रक्त और त्याग से देश के स्वाभिमान को कभी झुकने नहीं दिया।

राजमाता रानी कर्णावती का जीवन और उनका सर्वोच्च बलिदान आज भी भारतीय इतिहास में स्त्री शक्ति, अटूट भक्ति और राष्ट्रप्रेम के एक महान प्रतीक के रूप में जीवित है, जो युगों-युगों तक प्रेरणा देता रहेगा।

Pratahkal HQ

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