कौन थीं रानी कर्णावती? मेवाड़ की वो वीरांगना जिन्होंने मातृभूमि के सम्मान के लिए अग्नि को गले लगा लिया।
राणा सांगा की मृत्यु के बाद चित्तौड़गढ़ की रक्षा और गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के विरुद्ध रानी कर्णावती के ऐतिहासिक बलिदान की पूरी कहानी।

बूंदी की राजकुमारी और मेवाड़ की राजमाता रानी कर्णावती का जीवन भारतीय इतिहास में अदम्य साहस, कूटनीति और सर्वोच्च बलिदान की एक अनूठी गाथा है। राव नरबुध की पुत्री और हाड़ा चौहान वंश की इस तेजस्वी राजकुमारी का विवाह मेवाड़ के प्रतापी शासक राणा सांगा से हुआ था। उनके जीवन का सफर केवल एक रानी के रूप में नहीं, बल्कि एक कुशल प्रशासक और संरक्षक के तौर पर पहचाना जाता है, जिन्होंने राणा सांगा की मृत्यु के बाद अत्यंत कठिन परिस्थितियों में मेवाड़ की बागडोर संभाली। जब 1528 में राणा सांगा का देहावसान हुआ और उसके पश्चात उनके सौतेले पुत्र रतन सिंह गद्दी पर बैठे, तब रानी कर्णावती ने अपने पुत्रों, विक्रमादित्य और उदय सिंह के साथ रणथंभौर में निवास किया। इस दौरान उन्होंने राजनीतिक सूझबूझ का परिचय देते हुए मेवाड़ के हितों की रक्षा की और रतन सिंह की मृत्यु के बाद जब उनके अल्पवयस्क पुत्र विक्रमादित्य सिंहासन पर बैठे, तब रानी कर्णावती ने राजमाता के रूप में राज्य का संरक्षण (रीजेंट) स्वीकार किया।
वह दौर मेवाड़ के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था क्योंकि सुल्तान बहादुर शाह के नेतृत्व में गुजरात की सेना ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया था। विक्रमादित्य के अनुभवहीन नेतृत्व और सामंतों की नाराजगी के कारण राज्य पर संकट के बादल मंडरा रहे थे, लेकिन रानी कर्णावती ने हार मानने के बजाय अपनी बुद्धिमत्ता से उन सामंतों को एकजुट किया जो युद्ध के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने सिसोदिया वंश के गौरव और मेवाड़ की अस्मिता का आह्वान करते हुए राजपूत सरदारों को युद्ध के लिए प्रेरित किया। युद्ध की विभीषिका को देखते हुए उन्होंने अपने पुत्रों विक्रमादित्य और उदय सिंह की सुरक्षा के लिए उन्हें पन्ना धाय के साथ ननिहाल बूंदी भेज दिया। यद्यपि बाद की लोक कथाओं में मुगल सम्राट हुमायूं को राखी भेजने का उल्लेख मिलता है, किंतु समकालीन इतिहासकारों के अनुसार यह मेवाड़ को बचाने का उनका एक कूटनीतिक प्रयास मात्र था। 8 मार्च, 1535 को जब यह स्पष्ट हो गया कि गुजरात की विशाल सेना के सामने चित्तौड़ का पतन निश्चित है, तब रानी कर्णावती ने भागने या आत्मसमर्पण करने के बजाय जौहर का कठिन मार्ग चुना। उनके नेतृत्व में मेवाड़ की हजारों वीरांगनाओं ने अग्नि कुंड में प्रवेश किया, जबकि पुरुषों ने केसरिया बाना पहनकर अंतिम युद्ध (शाका) लड़ा। रानी कर्णावती का यह बलिदान चित्तौड़ के इतिहास का दूसरा सबसे बड़ा जौहर बना, जो आज भी भारतीय नारी के स्वाभिमान और वीरता का प्रतीक माना जाता है।

