कौन थीं रानी गाइदिनल्यू? नागालैंड की वह 'झांसी की रानी' जिसने अंग्रेजों की जड़ें हिला दी थीं।
मणिपुर में जन्मी रानी गाइदिनल्यू ने महज 13 साल की उम्र में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व किया और 14 वर्ष जेल में बिताए।

भारत की स्वतंत्रता के महायज्ञ में पूर्वोत्तर की पहाड़ियों से उठी एक ऐसी ज्वाला जिसने ब्रिटिश हुकूमत को थर्राने पर मजबूर कर दिया, वह नाम है रानी गाइदिनल्यू। मणिपुर के नुंगकाओ गाँव के रोंगमेई नागा समुदाय में 26 जनवरी 1915 को जन्मी गाइदिनल्यू बचपन से ही अदम्य साहस और स्वाभिमान की प्रतिमूर्ति थीं। उनकी जीवन यात्रा मात्र 13 वर्ष की आयु में एक निर्णायक मोड़ पर तब पहुँची, जब वह अपने चचेरे भाई और प्रसिद्ध नागा नेता जादोनंग के संपर्क में आईं। जादोनंग मणिपुर से ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए एक आध्यात्मिक और राजनीतिक आंदोलन चला रहे थे, लेकिन इससे पहले कि वह अपनी योजनाओं को पूर्ण रूप दे पाते, अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर 29 अगस्त 1931 को फांसी दे दी। इस दुखद घटना ने युवा गाइदिनल्यू के भीतर प्रतिशोध और राष्ट्रभक्ति की अग्नि को और प्रज्वलित कर दिया और विद्रोह की कमान अब इस किशोरी के हाथों में आ गई। उन्होंने महात्मा गांधी के आह्वान से प्रभावित होकर घोषणा की कि वे अंग्रेजों को किसी भी प्रकार का कर नहीं देंगे, जिसके बाद उन्होंने विभिन्न नागा जनजातियों को एकजुट कर एक संयुक्त मोर्चा तैयार किया। उनकी निर्भीकता और दैवीय आभा के कारण आदिवासी समाज उन्हें एक शक्ति स्वरूपा देवी के रूप में देखने लगा और जल्द ही मात्र 16 वर्ष की आयु में वह चार हजार सशस्त्र नागा सैनिकों की सेना का नेतृत्व करने लगीं।
छापामार युद्ध और हथियार चलाने में माहिर गाइदिनल्यू ने भूमिगत रहकर ब्रिटिश सेना के खिलाफ मोर्चा खोल दिया, जिससे घबराकर अंग्रेजों ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए कई गांवों को आग के हवाले कर दिया, परंतु जन-उत्साह कम नहीं हुआ। एक साहसिक कदम उठाते हुए गाइदिनल्यू ने अपने चार हजार साथियों के रहने के लिए एक विशाल किले का निर्माण शुरू किया, लेकिन निर्माण कार्य के दौरान ही 17 अप्रैल 1932 को ब्रिटिश सेना ने अचानक आक्रमण कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन पर मुकदमा चला और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई, जिसके कारण उन्हें अपने जीवन के 14 बहुमूल्य वर्ष जेल की सलाखों के पीछे बिताने पड़े। उनकी वीरता को देखते हुए पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें 'रानी' की उपाधि दी और उनकी तुलना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से की। 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद ही उनकी रिहाई संभव हो सकी, हालांकि बाद के वर्षों में नागा जनजातियों के आंतरिक संघर्ष के कारण उन्हें पुनः 1960 में कुछ समय के लिए भूमिगत होना पड़ा। राष्ट्र के प्रति उनकी निस्वार्थ सेवा और अद्वितीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1972 में स्वतंत्रता सेनानी ताम्रपत्र और 1982 में प्रतिष्ठित 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त उन्हें विवेकानंद सेवा सम्मान और बिरसा मुंडा पुरस्कार जैसे सम्मानों से भी नवाजा गया तथा उनकी स्मृति में डाक टिकट भी जारी किया गया। रानी गाइदिनल्यू का जीवन भारतीय नारी शक्ति और पूर्वोत्तर के गौरवशाली इतिहास का वह अध्याय है, जो आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रवाद और अटूट संकल्प की प्रेरणा देता रहेगा।

