कौन थे वीरंगना रानाबाई? राजस्थान की दूसरी मीरा और शौर्य की प्रतीक एक महान संत की गाथा।
नागौर के हरनावा में जन्मी रानाबाई ने मुगल सेनापति का वध कर धर्म की रक्षा की और फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी को जीवित समाधि ली।

राजस्थान की मरुधरा न केवल शूरवीरों की जननी रही है, बल्कि यह भक्ति और शक्ति के अद्भुत संगम की साक्षी भी है, जिसका एक अनुपम उदाहरण भक्त शिरोमणि रानाबाई हैं। नागौर जिले की परबतसर तहसील के हरनावा गांव में विक्रम संवत 1561 की अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर चौधरी जालम सिंह जी धूण के घर जन्मी रानाबाई को आज पूरे उत्तर भारत में 'राजस्थान की दूसरी मीरा' के रूप में पूजा जाता है। उनका जीवन बचपन से ही ईश्वरीय चेतना और साहस से ओतप्रोत था। उनके पूर्वज मूलतः जैसलमेर से थे और धूण गोत्र के जाट परिवार से ताल्लुक रखते थे। संत चतुर दास जी (खोजीजी) की शिष्या बनकर उन्होंने भगवान राम की अनन्य भक्ति का मार्ग चुना। उनके जीवन से जुड़ी अलौकिक कथाएं आज भी जनमानस में जीवंत हैं; कहा जाता है कि जब उनके पिता को कुछ नकारात्मक शक्तियों ने घेर लिया था, तब रानाबाई ने अपनी आत्मिक ऊर्जा और दिव्य शक्तियों से उन बाधाओं का विनाश किया और आजीवन अविवाहित रहकर लोक कल्याण एवं भक्ति को ही अपना धर्म माना।
रानाबाई की ख्याति केवल उनकी भक्ति तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे एक रक्षक और पथ-प्रदर्शक के रूप में भी उभरीं। जब बोराड़ के मेड़तिया ठाकुर राज सिंह जोधपुर दरबार की सहायता के लिए युद्ध पर जा रहे थे, तब हरनावा में रानाबाई ने उन्हें विजय का आशीर्वाद दिया। उनके द्वारा ठाकुर की पीठ पर लगाया गया गोबर का थापा केसरिया रंग में बदल गया, जो उनकी सिद्धियों का प्रमाण था। युद्ध क्षेत्र में जब तक ठाकुर को रानाबाई के चूड़ियों वाले हाथ का आभास होता रहा, वे अजेय बने रहे। रानाबाई का व्यक्तित्व कोमलता और कठोरता का मिश्रण था; जब एक मुगल सेनापति ने उनकी सुंदरता से मोहित होकर उन पर हमला करने और उनका अपहरण करने का दुस्साहस किया, तब इस शांत दिखने वाली भक्त ने चंडी का रूप धारण कर लिया और उस सेनापति सहित सैकड़ों मुगल सैनिकों का संहार कर धर्म और अपनी गरिमा की रक्षा की। उनकी काव्य रचनाएं 'पदावली' के रूप में राजस्थानी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं, जो सरल लय और गहरी आध्यात्मिकता के साथ जन-जन के कंठ में रची-बसी हैं।
अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में, विक्रम संवत 1627 के फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को रानाबाई ने जीवित समाधि ले ली। उनकी यह समाधि स्थली आज हरनावा में एक प्रमुख शक्तिपीठ के रूप में स्थापित है, जहां हर माह की त्रयोदशी को विशाल मेला भरता है और श्रद्धालु अपनी मन्नतें लेकर आते हैं। उनकी विरासत को आज भी उनके वंशज संभाल रहे हैं और उस स्थान की पवित्रता का प्रमाण वहां होने वाले चमत्कार देते हैं। उनकी कर्मस्थली हरनावा पट्टी ने देश को रामकरण ठाकरान और वीर चक्र विजेता मांगेज सिंह जैसे शहीद भी दिए हैं, जो यह दर्शाता है कि रानाबाई द्वारा रोपित साहस के बीज आज भी इस मिट्टी में फल-फूल रहे हैं। राजस्थान के इतिहास और सांस्कृतिक चेतना में रानाबाई का नाम एक ऐसी ज्योति के समान है, जो भक्ति, स्वाभिमान और नारी शक्ति के गौरवपूर्ण अध्याय को सदा आलोकित करती रहेगी।

