चौदहवीं शताब्दी का वह दौर जब मेवाड़ की धरती दिल्ली सल्तनत के दमनकारी शासन तले कराह रही थी, तब इतिहास के पन्नों में एक ऐसे महानायक का उदय हुआ जिसने न केवल अपने पूर्वजों के खोए हुए सम्मान को वापस पाया, बल्कि सिसोदिया राजवंश की एक ऐसी सुदृढ़ नींव रखी जो आने वाली कई सदियों तक अडिग रही। अरिसिंह के पुत्र और लक्ष्मणसिंह के पौत्र राणा हम्मीर सिंह, जिन्हें आज भी 'मेवाड़ का उद्धारक' कहा जाता है, का जन्म उस कालखंड में हुआ था जब चित्तौड़गढ़ पर खिलजी सेना का अधिकार था। गुहिल वंश की रावल शाखा के अंतिम शासक रावल रतन सिंह के बलिदान के बाद मेवाड़ का शासन छिन्न-भिन्न हो गया था। ऐसे विषम संकट काल में सीसोद गाँव के ठाकुर हम्मीर ने खैरवाड़ा को अपना सैन्य केंद्र बनाया और अपनी अदम्य वीरता व कूटनीति के बल पर चित्तौड़ को पुनः मुक्त कराने का संकल्प लिया।

हम्मीर का शुरुआती संघर्ष चुनौतियों और विफलताओं से भरा था। कई प्रयासों के बाद भी जब चित्तौड़गढ़ उनके हाथ नहीं आया और सैन्य संसाधन कम होने लगे, तो एक समय ऐसा भी आया जब वे अपने शेष सिपाहियों के साथ द्वारका की तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े। इसी यात्रा के दौरान गुजरात के खोड़ गाँव में उनकी भेंट देवी बिरवड़ी से हुई, जिन्हें हिंगलाज माता का अवतार माना जाता था। देवी के आशीर्वाद और उनके पुत्र बारूजी द्वारा प्रदान की गई 500 श्रेष्ठ घोड़ों की सैन्य सहायता ने हम्मीर के संकल्प में नई जान फूंक दी। इस बीच, राजनीतिक समीकरणों को साधते हुए जब मालदेव ने अपनी पुत्री सोंगारी का विवाह हम्मीर से किया, तब खिलजी के क्रोध ने हम्मीर को निर्णायक प्रहार का अवसर प्रदान किया। अपनी सेना और चारण सहयोगियों के साथ मिलकर हम्मीर ने एक भीषण आक्रमण किया और वर्ष 1326 ईस्वी में पुनः चित्तौड़गढ़ पर विजय प्राप्त कर मेवाड़ में स्वतंत्र हिंदू सत्ता की स्थापना की।

राणा हम्मीर की वीरता का सबसे गौरवशाली अध्याय सिंगोली का युद्ध माना जाता है, जहाँ उनका सामना दिल्ली के सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक की विशाल सेना से हुआ। इस ऐतिहासिक युद्ध में हम्मीर सिंह ने न केवल तुगलक की सेना को पराजित किया, बल्कि सुल्तान को बंदी बनाकर अपनी सैन्य श्रेष्ठता सिद्ध कर दी। उनकी इसी अटूट साहस और संकट काल में सिंह के समान अडिग रहने की क्षमता के कारण ही महाराणा कुंभा ने कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति में उन्हें 'विषम घाटी पंचानन' की उपाधि से विभूषित किया। शासन को व्यवस्थित करने के बाद उन्होंने अपनी सहायता करने वाले बारूजी को साम्राज्य के 'प्रोलपात पाटवी' पद से सम्मानित किया और चित्तौड़ दुर्ग में देवी बिरवड़ी की स्मृति में अन्नपूर्णा माता का भव्य मंदिर बनवाया। वर्ष 1364 ईस्वी में अपनी मृत्यु तक उन्होंने मेवाड़ को उत्तर भारत की एक अजेय शक्ति बना दिया था। राणा हम्मीर सिंह का जीवन इस बात का प्रमाण है कि अटूट इच्छाशक्ति और सही रणनीति से खोया हुआ साम्राज्य और स्वाभिमान पुनः प्राप्त किया जा सकता है।

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