आधुनिक भारतीय अध्यात्म के आकाश में भगवान श्री रमण महर्षि एक ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने मानवता को बिना किसी जटिल कर्मकांड के सीधे आत्म-साक्षात्कार का मार्ग दिखाया। तीस दिसंबर अठारह सौ उनासी को तमिलनाडु के विरुधुनगर जिले में स्थित तिरुचुली गांव के एक रूढ़िवादी हिंदू ब्राह्मण परिवार में जन्मे वेंकटरामन अय्यर—जिन्हें बाद में दुनिया ने भगवान श्री रमण महर्षि के नाम से जाना—का जीवन अलौकिक अनुभवों और वैराग्य की एक अनूठी गाथा है। उनके पिता सुंदरम अय्यर एक दरबारी वकील थे और माता अलघम्मल एक धार्मिक महिला थीं। उनका परिवार शिव, विष्णु, गणेश, सूर्य और शक्ति की नियमित पूजा करता था। बचपन में अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के धनी वेंकटरामन केवल एक बार सुनकर तमिल कविताएं याद कर लेते थे, लेकिन वे इतनी गहरी नींद सोते थे कि भारी आवाज या शरीर पर चोट का भी उन पर कोई असर नहीं होता था। लगभग ग्यारह वर्ष की आयु में उन्हें अंग्रेजी शिक्षा के लिए डिंडिगुल और फिर मदुरै भेजा गया ताकि वे सरकारी सेवा के योग्य बन सकें, परंतु नियति ने उनके लिए एक बिल्कुल अलग मार्ग चुना था। अठारह सौ बांधवे में पिता के अचानक निधन के बाद परिवार बिखर गया और वे अपने चाचा के पास मदुरै में ही रहे, जहां उन्होंने अमेरिकी मिशन हाई स्कूल में पढ़ाई की। नवंबर अठारह सौ पचानवे में जब उन्हें यह आभास हुआ कि पवित्र पर्वत अरुणाचल कोई काल्पनिक पौराणिक स्थान नहीं बल्कि इसी धरती पर साक्षात मौजूद है, तो उनके भीतर एक गहरा आकर्षण जाग उठा। इसी दौरान 'पेरियपुराणम्' पुस्तक में तिरसठ नयनमार संतों के जीवन चरित्र ने उनके दिल पर अमिट छाप छोड़ी और उन्हें ईश्वर से मिलन की संभावना का साक्षात बोध कराया।

जुलाई अठारह सौ छियानवे में मात्र सोलह वर्ष की आयु में वेंकटरामन के जीवन में वह निर्णायक मोड़ आया जिसने उन्हें साधारण बालक से एक जीवन्मुक्त संत बना दिया। अचानक उनके भीतर मृत्यु का एक तीव्र और भयानक भय पैदा हुआ। इस डर ने उन्हें अंदरूनी खोज के लिए प्रेरित किया और वे खुद से पूछने लगे कि वास्तव में किसकी मृत्यु होती है? शरीर तो जड़ हो जाता है, लेकिन इसके भीतर जो चेतना या प्राण-शक्ति का प्रवाह है, वह कभी नहीं मरता। इस 'मृत्यु-अनुभव' के दौरान उन्हें अपनी वास्तविक आत्मा का साक्षात बोध हुआ, जिसे उन्होंने ईश्वर या शिव के रूप में पहचाना। इस आध्यात्मिक जागृति को उन्होंने बाद में 'अक्रम मुक्ति' यानी अचानक मिली मुक्ति कहा, जो ज्ञान योग के क्रमिक मार्ग से बिल्कुल अलग थी। इस घटना के बाद सांसारिक जीवन, पढ़ाई और मित्रों में उनकी रुचि पूरी तरह समाप्त हो गई। वे स्कूल में गुमसुम रहने लगे और मदुरै के मीनाक्षी मंदिर में नयनमार संतों की मूर्तियों के सामने घंटों रोते हुए वैराग्य की प्रार्थना करते थे। अठठाइस अगस्त अठारह सौ छियानवे को वे अपने घर से बिना किसी को बताए चुपचाप निकल गए और एक सितंबर अठारह सौ छियानवे को पवित्र पर्वत अरुणाचल की नगरी तिरुवन्नमलई पहुंचे, जिसे उन्होंने जीवन के अंत तक अपना निवास स्थान बनाया।

तिरुवन्नमलई पहुंचने के बाद उनकी तपस्या का एक अत्यंत कठिन दौर शुरू हुआ। वे अरुणाचलेश्वर मंदिर के हजार स्तंभों वाले हॉल और फिर 'पाताल-लिंगम' नामक भूमिगत तहखाने में गहरे समाधि खंडों में लीन रहने लगे, जहां कीड़े-मकोड़ों के काटने का भी उन्हें कोई होश नहीं रहता था। स्थानीय संत शेषाद्रि स्वामीगल ने उन्हें इस स्थिति में खोजा और उनकी रक्षा की। छह सप्ताह बाद जब उन्हें बाहर निकाला गया, तो शरीर सुध-बुध खो चुका था और उन्हें जीवित रखने के लिए मुंह में जबरन भोजन डालना पड़ता था। फरवरी अठारह सौ सत्तानवे में वे गुरुमूर्तम मंदिर में चले गए, जहां पालनीस्वामी नाम के एक साधु उनके स्थायी सेवक बने। रमण महर्षि ने अपने शरीर की पूरी तरह उपेक्षा कर दी थी और चींटियों के लगातार काटने के बाद भी वे ध्यानमग्न रहते थे। उनकी इस घोर तपस्या और मौन ने धीरे-धीरे लोगों को आकर्षित किया। जब उनके परिवार को उनका पता चला, तो उनके चाचा और बाद में उनकी माता अलघम्मल ने उनसे घर लौटने की भावुक गुहार लगाई, परंतु वे अडिग रहे। फरवरी अठारह सौ निन्यानवे में वे अरुणाचल पहाड़ी पर रहने चले गए और अगले सत्रह वर्षों तक 'विरूपाक्ष गुफा' में निवास किया। वर्ष उन्निस सौ दो में शिवप्रकासम पिल्लई नामक एक सरकारी अधिकारी ने उनसे अपनी वास्तविक पहचान जानने के लिए चौदह प्रश्न पूछे, जिसके लिखित उत्तर आगे चलकर उनकी पहली और सबसे प्रसिद्ध शिक्षा 'नान यार?' यानी 'मैं कौन हूँ?' के रूप में प्रकाशित हुए। उन्निस सौ सात में महान वैदिक विद्वान काव्यकंठ श्री गणपति शास्त्री ने उनसे आत्म-पूछताछ (आत्म-विचार) की दीक्षा ली और उन्हें 'भगवान श्री रमण महर्षि' नाम दिया।

समय के साथ उनकी ख्याति देश-विदेश में फैलने लगी और वर्ष उन्निस सौ ग्यारह में फ्रैंक हम्फ्रीज नाम के एक ब्रिटिश पुलिस अधिकारी के माध्यम से पश्चिमी जगत को उनके बारे में पता चला। उन्निस सौ सोलह में उनकी माता और छोटे भाई भी उनके साथ स्कंदाश्रम गुफा में रहने आ गए। इसी अवधि में महर्षि ने अपनी महान काव्यात्मक रचना 'अरुणाचल अक्षरा मन मलाई' की रचना की, जो आत्मा और परमात्मा के मिलन का एक अद्भुत प्रतीक है। मई उन्निस सौ बाईस में उनकी माता के अवसान के बाद, उनकी समाधि के चारों ओर 'श्री रमणाश्रमम' का विकास हुआ, जहाँ महर्षि उन्निस सौ पचास तक रहे। आश्रम के कार्यों जैसे भोजन पकाने और पत्तलें सिलने में वे स्वयं सक्रिय रहते थे। उन्निस सौ चौंतीस में पॉल ब्रंटन की पुस्तक 'ए सर्च इन सीक्रेट इंडिया' के प्रकाशन ने उन्हें दुनिया भर में बेहद लोकप्रिय बना दिया, जिसके बाद परमहंस योगानंद, समरसेट मॉम और आर्थर ओसबोर्न जैसी कई महान हस्तियों ने उनके दर्शन किए। महर्षि के लिए दर्शन देना ही उनके जीवन का मुख्य कार्य था और वे अंतिम समय तक सभी के लिए सुलभ रहे। वे 'मौन' को ही सबसे अचूक और पूर्ण आध्यात्मिक उपदेश मानते थे। उनका स्पष्ट मत था कि हमारा वास्तविक स्वरूप 'सच्चिदानंद' (सत्य-चित्त-आनंद) है, जो मन के विचारों से परे हमेशा उपस्थित रहता है। नवंबर उन्निस सौ अड़तालीस में उनके हाथ में कैंसर की गांठ का पता चला, जिसके बाद कई ऑपरेशन हुए। अत्यधिक कमजोर होने के बाद भी जब भक्तों ने उनसे खुद को ठीक करने की प्रार्थना की, तो उन्होंने सहजता से कहा कि तुम इस शरीर से इतने आसक्त क्यों हो, मैं कहाँ जा सकता हूँ, मैं यहीं हूँ। चौदह अप्रैल उन्निस सौ पचास की रात को आठ बजकर सैंतालीस मिनट पर जब उन्होंने महासमाधि ली, तो आकाश में एक टूटता हुआ तारा देखा गया, जिसने भक्तों को स्तब्ध कर दिया। भगवान श्री रमण महर्षि आज भौतिक रूप में हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी 'मैं कौन हूँ?' की आत्म-अन्वेषण पद्धति और उनका पावन जीवन आज भी दुनिया भर के साधकों को आत्म-साक्षात्कार का सीधा मार्ग दिखा रहा है।

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