भारत के स्वास्थ्य ढांचे की आधारशिला रखने वाली और महात्मा गांधी के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने वाली राजकुमारी अमृत कौर आधुनिक भारत की एक ऐसी अप्रतिम शिल्पी थीं, जिन्होंने राजसी वैभव को त्यागकर मानवता की सेवा का कठिन मार्ग चुना।

2 फरवरी 1889 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ में जन्मीं अमृत कौर अहलूवालिया का जीवन प्रारंभिक काल से ही उत्कृष्टता की ओर अग्रसर था। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा इंग्लैंड में प्राप्त की और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से एम.ए. की डिग्री हासिल करने के बाद वे स्वदेश लौटीं, जहाँ उनके भीतर छिपी देशप्रेम की भावना ने उन्हें स्वाधीनता संग्राम की ओर प्रेरित किया। वे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचारों से इतनी प्रभावित हुईं कि निरंतर 16 वर्षों तक उनकी सचिव के रूप में सेवा की और स्वतंत्रता सेनानी के साथ-साथ एक प्रखर सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उभरीं। उनकी बौद्धिक क्षमता का लोहा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी माना गया, जिसका प्रमाण 1945 और 1946 में लंदन और पेरिस में आयोजित यूनेस्को की बैठकों में भारतीय प्रतिनिधिमंडल के उप-नेता के रूप में उनकी उपस्थिति थी। आजादी के बाद 1947 से 1957 तक उन्होंने स्वतंत्र भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री के रूप में कार्यभार संभाला और देश की जर्जर स्वास्थ्य व्यवस्था को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया।

राजकुमारी अमृत कौर के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की स्थापना थी। वर्ष 1956 में उन्होंने इसके लिए लोकसभा में विधेयक पेश किया और इसके निर्माण के लिए न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, पश्चिम जर्मनी, स्वीडन और अमेरिका जैसे देशों से आर्थिक सहायता जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति उनके समर्पण का स्तर इतना ऊंचा था कि उन्होंने और उनके भाई ने शिमला स्थित अपनी पैतृक संपत्ति 'मनोविल' को संस्थान के कर्मचारियों और नर्सों के लिए हॉलिडे होम के रूप में दान कर दिया। स्वास्थ्य मंत्री के रूप में उन्होंने केवल अस्पतालों का ही निर्माण नहीं किया, बल्कि रेड क्रॉस और सेंट जॉन एम्बुलेंस ब्रिगेड जैसी संस्थाओं के माध्यम से जन-जन तक चिकित्सा सहायता पहुंचाई। खेल और कला के प्रति उनका अनुराग भी अद्वितीय था; वे एक बेहतरीन टेनिस खिलाड़ी थीं और उन्होंने 'नेशनल स्पोर्ट्स क्लब ऑफ इंडिया' की स्थापना कर उसकी अध्यक्षता भी की। सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करने वाली अमृत कौर शाकाहार और धार्मिक ग्रंथों जैसे रामायण, गीता और बाइबिल के पठन में शांति खोजती थीं। उनके इन्हीं महान कार्यों और विद्वता के कारण दिल्ली विश्वविद्यालय सहित कई विदेशी कॉलेजों ने उन्हें मानद डॉक्टरेट से सम्मानित किया।

हिमाचल प्रदेश के मंडी से अपना पहला चुनाव जीतने वाली राजकुमारी अमृत कौर ने न केवल भारत में बल्कि विश्व स्वास्थ्य सभा की अध्यक्ष बनकर अंतरराष्ट्रीय पटल पर भी भारत का गौरव बढ़ाया। 2 अक्टूबर 1964 को दिल्ली में उनके महाप्रयाण के साथ एक युग का अंत हुआ, लेकिन उनकी इच्छा के अनुरूप किए गए उनके अंतिम संस्कार और उनके द्वारा स्थापित एम्स जैसे संस्थान आज भी उनके दूरदर्शी नेतृत्व और निस्वार्थ सेवा की जीवंत गवाही देते हैं।

Pratahkal HQ

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