कौन थे राज राजेन्द्र चोल? समुद्र की लहरों पर भारत का परचम लहराने वाले अजेय सम्राट।
चोल साम्राज्य के महान शासक राजेन्द्र प्रथम की सैन्य रणनीति, विशाल नौसेना और दक्षिण-पूर्व एशिया में उनके ऐतिहासिक विजय अभियानों का विस्तृत विवरण।

भारत का सैन्य इतिहास अदम्य साहस और शौर्य की गौरवशाली कहानियों से भरा पड़ा है, लेकिन प्राचीन काल में जब अधिकांश शक्तियाँ केवल मैदानी युद्धों तक सीमित थीं, तब दक्षिण भारत के क्षितिज पर एक ऐसे महाप्रतापी सम्राट का उदय हुआ जिसने समुद्र की सीमाओं को चुनौती दी। यह सम्राट थे राज राजेन्द्र चोल प्रथम, जिन्होंने न केवल भारत की सैन्य सामर्थ्य को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया बल्कि एक ऐसी अजेय नौसेना का निर्माण किया जिसकी धमक पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में सुनाई दी। राजेन्द्र चोल ने वर्ष 985 ईस्वी में अपने पिता द्वारा रखी गई सुदृढ़ नींव पर साम्राज्य का कार्यभार संभाला, किंतु उनकी महानता उनके धैर्य में छिपी थी। उन्होंने सत्ता संभालने के बाद जल्दबाजी के बजाय पूरे आठ वर्षों तक प्रतीक्षा की और इस दौरान अपनी सैन्य शक्ति, विशेषकर नौसेना को इतना आधुनिक और घातक बनाया कि वह जल और थल दोनों ही क्षेत्रों में काल बनकर उभरने को तैयार हो गई।
राजेन्द्र चोल की सेना किसी पारंपरिक दल की तरह नहीं, बल्कि आज की एक पेशेवर फौज की भांति सुव्यवस्थित थी, जिसके चार प्रमुख स्तंभ थे। उनकी घुड़सवार सेना, पैदल सेना और प्रसिद्ध हाथी सेना ने युद्धक्षेत्र में अद्वितीय पराक्रम दिखाया। चोल सेना की सबसे बड़ी विशेषता उनके युद्धपोतों और प्रशिक्षित हाथियों का समन्वय था। यह कल्पना करना भी आज रोमांच पैदा करता है कि एक हजार साल पहले चोल राजा ने विशाल समुद्री जहाजों पर हाथियों की पूरी फौज लादकर श्रीलंका जैसे द्वीपों पर सफल आक्रमण किए थे। उनकी नौसेना में पदों का विभाजन आधुनिक नौसैनिक प्रणाली की याद दिलाता है, जहाँ सम्राट स्वयं 'चक्रवर्ती' के रूप में सर्वोच्च सेनापति होते थे और उनके नीचे जलाधिपति, देवार और गणपत जैसे अधिकारी बेड़े का संचालन करते थे। उनके पास 'धरानी', 'लूला' और 'वज्रा' जैसे विभिन्न श्रेणियों के युद्धपोत थे, जो आज के विध्वंसक और युद्धपोतों के प्राचीन समकक्ष माने जा सकते हैं।
सम्राट राजेन्द्र चोल की रणनीतिक दूरदर्शिता का ही परिणाम था कि उन्होंने बंगाल की खाड़ी को पार कर जावा, सुमात्रा, इंडोनेशिया, बर्मा, वियतनाम, मलेशिया और सिंगापुर तक अपना वर्चस्व स्थापित किया। वर्ष 993 ईस्वी में श्रीलंका पर विजय और 994 ईस्वी में कंदलूर के युद्ध में चेर वंश के राजा भास्कर रवि वर्मन के जंगी बेड़े को नेस्तनाबूद करना उनकी महान उपलब्धियों का हिस्सा मात्र था। चोल साम्राज्य की प्रगतिशील सोच का प्रमाण इस बात से भी मिलता है कि एक हजार वर्ष पूर्व उनकी सेना में महिलाएं न केवल शामिल थीं, बल्कि सक्रिय रूप से युद्धों में भाग भी लेती थीं। चोल राजाओं की शक्ति इतनी चरम पर थी कि उनके काल में बंगाल की खाड़ी को 'चोलों की झील' कहा जाने लगा था। यह गौरवशाली अध्याय हमें याद दिलाता है कि भारत कभी केवल अपनी सीमाओं की रक्षा नहीं करता था, बल्कि समुद्र पार कर अपनी संस्कृति और शक्ति का लोहा मनवाने वाला विश्व का एक महान नौसैनिक केंद्र था, जिसकी विरासत आज भी इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में अंकित है।

