कौन थे राजा महेंद्र प्रताप सिंह? आज़ादी के आंदोलन का वह नायक जिसने विदेश में बनाई भारत की पहली सरकार।
राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अफगानिस्तान के काबुल में निर्वासित सरकार बनाकर ब्रिटिश हुकूमत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चुनौती दी थी।

भारत की स्वतंत्रता के इतिहास में कुछ ऐसे महानायकों के नाम दर्ज हैं, जिन्होंने मातृभूमि को गुलामी की बेड़ियों से आज़ाद कराने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया और वैश्विक स्तर पर क्रांति की मशाल जलाई।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में राजा महेंद्र प्रताप सिंह एक दूरदर्शी क्रांतिकारी, समाज सुधारक और पत्रकार के रूप में जाने जाते हैं, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। 1 दिसंबर 1886 को उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले के मुरसान राज्य के जाट शासक परिवार में जन्मे राजा महेंद्र प्रताप सिंह का जीवन बचपन से ही उच्च आदर्शों और देशभक्ति की भावना से प्रेरित था। राजा घनश्याम सिंह के पुत्र के रूप में जन्मे महेंद्र प्रताप को बाद में हाथरस के राजा हरनारायण सिंह ने गोद ले लिया था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा अलीगढ़ में हुई, जहाँ उन्होंने मोहम्मद एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज (जो बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना) से पढ़ाई की। अपने कॉलेज के दिनों से ही उनके भीतर सामाजिक सुधार और राष्ट्रवाद की भावना बलवती होने लगी थी, जिसके कारण उन्होंने देश-विदेश की यात्राएं कर अपनी राजनीतिक सोच को व्यापक बनाया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने यह गहराई से महसूस किया कि भारत की आज़ादी के लिए बाहरी शक्तियों का सहयोग और अंतरराष्ट्रीय दबाव बेहद आवश्यक है। इसी सोच के साथ उन्होंने साल 1915 में अफगानिस्तान के काबुल में भारत की पहली अस्थायी सरकार (गवर्नमेंट इन एक्साइल) की स्थापना की, जिसमें वे स्वयं राष्ट्रपति बने और मौलवी बरकतुल्लाह को इसका प्रधानमंत्री बनाया गया। इस सरकार को जर्मनी, ऑस्ट्रिया और तुर्की जैसी वैश्विक शक्तियों ने मान्यता भी दी थी, जो ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एक बहुत बड़ी कूटनीतिक और ऐतिहासिक उपलब्धि थी। राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने आज़ादी की लड़ाई को मजबूत करने के लिए दुनिया भर के कई देशों जैसे रूस, जापान और चीन की यात्राएं कीं और वहां के शीर्ष नेताओं से मुलाकात कर भारतीय स्वतंत्रता के लिए समर्थन जुटाया। व्लादिमीर लेनिन से उनकी मुलाकात इतिहास के पन्नों में विशेष स्थान रखती है। देश के भीतर सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने अपनी पैतृक संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना के लिए दान कर दिया, जिसमें अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के लिए जमीन देना और वृंदावन में प्रेम महाविद्यालय की स्थापना करना शामिल था। ब्रिटिश सरकार ने उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों से घबराकर उनकी संपत्ति जब्त कर ली थी और उन्हें देश निकाला दे दिया था, जिसके कारण उन्हें लगभग 31 साल देश से बाहर निर्वासन में बिताने पड़े। साल 1946 में भारत लौटने के बाद भी जनसेवा के प्रति उनका समर्पण कम नहीं हुआ और आज़ादी के बाद साल 1957 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने मथुरा निर्वाचन क्षेत्र से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की और संसद पहुंचे। राजा महेंद्र प्रताप सिंह का पूरा जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सच्चा नेतृत्व केवल सत्ता से नहीं, बल्कि त्याग, दूरदर्शिता और राष्ट्र के प्रति निस्वार्थ समर्पण से जन्म लेता है। उनका राष्ट्रवाद सीमाओं में बंधा नहीं था, बल्कि वे एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था के हिमायती थे जहाँ मानवता और समानता सर्वोपरि हो। आज भी उनका जीवन और उनके विचार देश की आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्र निर्माण और सामाजिक एकता के मार्ग पर चलने की निरंतर प्रेरणा देते हैं।

