कौन थे राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन? भारतीय स्वाधीनता संग्राम के ‘कर्मयोगी’ और हिंदी के सबसे प्रखर सेनानी की शौर्यगाथा
राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन का जीवन परिचय, स्वतंत्रता संग्राम में योगदान और हिंदी को राजभाषा बनाने के उनके ऐतिहासिक संघर्ष का विस्तृत विवरण।

भारत की राजनीतिक और सामाजिक चेतना में एक नए युग का सूत्रपात करने वाले भारत रत्न राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन का व्यक्तित्व एक ऐसे सागर के समान था जिसमें राष्ट्रवाद, साहित्य और समाज सेवा की त्रिवेणी समाहित थी। 1 अगस्त 1882 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में जन्मे टंडन जी ने अपना पूरा जीवन देश की स्वतंत्रता और भारतीय संस्कृति के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय सिटी एंग्लो-वर्नाकुलर स्कूल में हुई, जहाँ से उन्होंने मेधावी छात्र के रूप में अपनी पहचान बनाई। जीवन के प्रारंभिक चरण में ही उन्होंने कई व्यक्तिगत संघर्षों का सामना किया, जिनमें उनकी बड़ी बहन का देहावसान और फिर पिता का साया उठ जाना शामिल था, किंतु इन कठिन परिस्थितियों ने उनके संकल्प को और अधिक सुदृढ़ कर दिया। मुइर सेंट्रल कॉलेज में शिक्षा के दौरान ही वे क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय हो गए थे, जिसके कारण उन्हें कॉलेज से निष्कासित भी होना पड़ा, परंतु उन्होंने हार नहीं मानी और विधि तथा इतिहास में उच्च शिक्षा प्राप्त कर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में तेज बहादुर सप्रू जैसे दिग्गजों के साथ वकालत शुरू की।
टंडन जी के राजनीतिक सफर की शुरुआत 1905 के बंगाल विभाजन के विरोध स्वरूप स्वदेशी आंदोलन से हुई, जहाँ उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के संकल्प के साथ चीनी का त्याग कर दिया और गोपाल कृष्ण गोखले के अंगरक्षक के रूप में कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल हुए। उनका जीवन एक 'कर्मयोगी' का था, जिन्होंने गांधीजी के आह्वान पर अपनी चलती हुई वकालत छोड़कर असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उनके नेतृत्व में किसानों के हितों के लिए 'नो-रेंट' अभियान चलाया गया, जिसके कारण उन्हें सात बार जेल की यात्रायें करनी पड़ीं। 1937 के विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की प्रचंड जीत का श्रेय उन्हीं के कुशल संगठन को जाता है, जिसके बाद वे निर्विरोध विधानसभा अध्यक्ष चुने गए। स्वाधीनता संग्राम में उनके इसी तप और ऋषि तुल्य जीवन के कारण उन्हें 'राजर्षि' की उपाधि से विभूषित किया गया। वे केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि एक प्रखर पत्रकार, कवि और निबंधकार भी थे, जिनकी लेखनी 'हिंदी प्रदीप' और 'अभ्युदय' जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से राष्ट्र की आवाज बनी।
हिंदी भाषा के प्रति उनका अनुराग केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि वैचारिक था। टंडन जी का मानना था कि हिंदी ही वह सूत्र है जो भारत की स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रख सकता है। उन्होंने हिंदी साहित्य सम्मेलन और हिंदी विद्यापीठ की स्थापना कर इस भाषा को जन-जन तक पहुँचाया। संविधान सभा के सदस्य के रूप में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के लिए उन्होंने पंडित नेहरू और गांधीजी जैसे दिग्गजों के 'हिंदुस्तानी' के प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया और अंततः हिंदी को देवनागरी लिपि के साथ राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित कराने में सफल रहे। उनका जीवन सादगी की पराकाष्ठा था; उन्होंने सालों तक अग्नि पर पका भोजन नहीं किया, चमड़े के जूतों का त्याग किया और सदैव सिद्धांतों के साथ खड़े रहे, यहाँ तक कि सिद्धांतों के लिए उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से भी इस्तीफा दे दिया।
राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन का व्यक्तित्व मानवतावादी मूल्यों और भारतीय संस्कृति के प्रति अटूट निष्ठा का मेल था। उन पर लगे सांप्रदायिकता के आरोपों का जवाब उनका वह जीवन दर्शन था जिसमें वे अपने घर के मुस्लिम सहायकों के साथ आत्मीय संबंध रखते थे और अन्याय के खिलाफ किसी भी धर्म के व्यक्ति के लिए प्राण देने को तैयार रहते थे। 1961 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से अलंकृत होने वाले टंडन जी का 1 जुलाई 1962 को स्वर्गवास हुआ, लेकिन उनकी विरासत आज भी उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय और हिंदी के प्रचार-प्रसार के रूप में जीवित है। वे एक ऐसे महापुरुष थे जिन्होंने राजनीति को सेवा का माध्यम बनाया और हिंदी को राष्ट्रीय अस्मिता का गौरव प्रदान किया, जिसके कारण उनका नाम भारतीय इतिहास के पन्नों पर सदैव स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा।

