कौन थे सम्राट पुलकेशिन द्वितीय? उत्तर भारत के चक्रवर्ती सम्राट को युद्ध में धूल चटाने वाले अजेय महायौद्धा की गाथा।
चालुक्य वंश के महान शासक पुलकेशिन द्वितीय की विजय गाथा, साम्राज्य विस्तार और कला-संस्कृति में उनके ऐतिहासिक योगदान का संपूर्ण विवरण।

छठी और सातवीं शताब्दी के दौरान दक्षिण भारत के भाग्य को एक नई दिशा देने वाले चालुक्य वंश के प्रतापी राजा पुलकेशिन द्वितीय, जिन्हें 'इमादी पुलकेशी' के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय इतिहास के उन विरल नायकों में से हैं जिनकी वीरता ने उत्तर और दक्षिण के बीच एक अभेद्य दीवार खड़ी कर दी थी। मूल रूप से बनवासी से संबंध रखने वाले चालुक्य शासकों के इस गौरवशाली प्रतिनिधि ने बादामी को अपनी राजधानी बनाकर एक ऐसे साम्राज्य की नींव रखी जिसका विस्तार पश्चिम सागर से लेकर बंगाल की खाड़ी तक और नर्मदा नदी के तटों से लेकर दक्षिण सागर तक फैला हुआ था। पुलकेशिन द्वितीय की सबसे बड़ी सैन्य उपलब्धि उत्तर भारत के शक्तिशाली सम्राट हर्षवर्धन पर उनकी निर्णायक विजय मानी जाती है, जिसे चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी प्रमाणित किया है कि किस प्रकार हर्ष की विशाल सेना चालुक्य साम्राज्य को जीतने में विफल रही थी। नर्मदा के तट पर हुए इस भीषण संघर्ष में पुलकेशिन ने 'सकलोत्तरपथेश्वर' कहे जाने वाले हर्ष को पराजित कर 'परमेश्वर' और 'दक्षिणापथेश्वर' की उपाधियां धारण कीं। उनकी विजय का रथ केवल उत्तर तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने पूर्व में दक्षिण कोसल और कलिंग के शासकों को अपने अधीन किया तथा विष्णुकुंडिन राजा को हराने के बाद अपने भाई विष्णुवर्धन को पूर्वी दक्कन का राज्यपाल नियुक्त किया, जिसने कालांतर में वेंगी के स्वतंत्र पूर्वी चालुक्य वंश की स्थापना की। यद्यपि दक्षिण में पल्लवों के विरुद्ध उन्हें शुरुआती सफलताएँ मिलीं, किंतु अंतिम समय में पल्लव राजा नरसिंहवर्मन प्रथम के आक्रमण के दौरान उन्हें संघर्ष का सामना करना पड़ा।
एक महान विजेता होने के साथ-साथ पुलकेशिन द्वितीय कला, संस्कृति और धर्म के महान संरक्षक भी थे। वे स्वयं वैष्णव मत के अनुयायी थे, परंतु उनके हृदय में शैव, बौद्ध और जैन धर्मों के प्रति समान सम्मान था, जिसका प्रमाण उनके शासनकाल में बने विविध धार्मिक स्थल हैं। उनके दरबारी कवि रविकीर्ति द्वारा रचित प्रसिद्ध 'ऐहोल शिलालेख' आज भी उनकी कीर्ति का गुणगान करता है। स्थापत्य कला के प्रेमी सम्राट ने न केवल कर्नाटक, बल्कि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र तक में मंदिरों का जाल बिछाया, यहाँ तक कि उनके प्रभाव और संबंधों के चलते थाईलैंड और कंबोडिया जैसे सुदूर देशों से हाथियों और घोड़ों का आयात किया जाता था। बादामी के भूतनाथ मंदिर की नक्काशी और वहाँ की गुफाओं में स्थापित जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं उनके शासनकाल की सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाती हैं। अलुवा वंश की राजकुमारी से विवाह करने वाले इस सम्राट ने दक्कन के पठार पर चालुक्य सत्ता का जो विस्तार किया, उसने भारतीय उपमहाद्वीप के मानचित्र पर दक्षिण भारत की शक्ति को एक नए और गौरवशाली रूप में स्थापित किया। पुलकेशिन द्वितीय का व्यक्तित्व और उनकी उपलब्धियां केवल युद्धों तक सीमित नहीं थीं, बल्कि उन्होंने एक ऐसे प्रशासनिक और सांस्कृतिक ढांचे का निर्माण किया जिसने आने वाली कई सदियों तक भारतीय इतिहास की दिशा को प्रभावित किया और उन्हें कालजयी बना दिया।

