सभ्यता के शैशव काल में जब मानवता अपने अस्तित्व की नींव रख रही थी, तब हजरत इदरीस एक ऐसे प्रकाश स्तंभ बनकर उभरे जिन्होंने न केवल रूहानियत बल्कि विज्ञान और कला के माध्यम से मनुष्य को एक नई पहचान दी।

इस्लामिक परंपरा और पवित्र कुरान के अनुसार, हजरत आदम के बाद इदरीस मानवता के दूसरे पैगंबर और मार्गदर्शक के रूप में प्रतिष्ठित हुए, जिन्हें बाइबिल की परंपराओं में 'हनोक' के नाम से भी जाना जाता है। उनके नाम 'इदरीस' का भाषाई मूल अरबी शब्द 'दर्स' से जुड़ा है, जिसका अर्थ अध्ययन करना होता है; यह उनके उस व्यक्तित्व को दर्शाता है जो दिव्य रहस्यों और पवित्र ग्रंथों के गहन बोध में लीन रहता था। इदरीस का जन्म बेबीलोन की ऐतिहासिक धरती पर हुआ था और अपनी युवावस्था में उन्होंने पैगंबर शीथ द्वारा दिए गए ईश्वरीय नियमों का पालन करते हुए अपनी आध्यात्मिक यात्रा शुरू की। जैसे-जैसे समय बीता, अल्लाह ने उन्हें पैगंबर के पद से नवाजा और उन्हें एक ऐसी कौम को राह दिखाने की जिम्मेदारी सौंपी जो धीरे-धीरे पथभ्रष्ट हो रही थी। जब बेबीलोन के लोगों ने उनके उपदेशों की अवहेलना की और पाप की राह पर अडिग रहे, तब इदरीस ने अपने वफादार अनुयायियों के साथ वहां से हिजरत करने का साहसिक निर्णय लिया। नील नदी के तट पर पहुंचने पर उन्होंने खुदा की महिमा का गुणगान किया और यहीं से उनकी शिक्षाओं का प्रसार मिस्र की धरती तक हुआ।

हजरत इदरीस का जीवन केवल उपदेशों तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्हें इतिहास का पहला ऐसा व्यक्तित्व माना जाता है जिसने कलम के माध्यम से लेखन कला की शुरुआत की और वस्त्र सिलने की कला का आविष्कार कर मनुष्य को सभ्यता का शालीन आवरण प्रदान किया। उनके ज्ञान का दायरा इतना विस्तृत था कि उन्हें खगोल विज्ञान, गणित और मापन प्रणालियों का आदि जनक भी कहा जाता है, जिसके कारण मध्यकालीन विद्वानों ने उन्हें 'हर्मिस ट्रिस्मेगिस्टस' यानी 'तिगुना बुद्धिमान' के रूप में पहचाना। कुरान में उन्हें 'सिद्दीक' (सत्यवादी) और 'साबिर' (धैर्यवान) की उपाधियों से विभूषित किया गया है, और उनकी आध्यात्मिक उच्चता का प्रमाण यह है कि उन्हें 'उच्च स्थान' पर उठाया गया था। हदीसों के अनुसार, पैगंबर मोहम्मद ने अपनी मेराज की यात्रा के दौरान चौथे आसमान पर इदरीस से मुलाकात की थी, जो उनके असाधारण रूतबे को दर्शाता है। इदरीस ने अपने जीवन को बड़ी कुशलता से विभाजित किया था, जहां वे सप्ताह के कुछ दिन जनसेवा और उपदेशों को समर्पित करते थे और शेष समय एकांत में ईश्वरीय आराधना में लीन रहते थे। उनका संघर्ष केवल बुराई के विरुद्ध नहीं था, बल्कि वे अज्ञानता के अंधेरे को ज्ञान की मशाल से मिटाने के प्रति समर्पित रहे।

पैगंबर इदरीस का व्यक्तित्व आज भी एक ऐसे मार्गदर्शक के रूप में अमर है जिन्होंने मनुष्य को यह सिखाया कि सत्य की खोज और ज्ञान का अर्जन ही ईश्वर की सच्ची इबादत है। उनका जीवन संदेश देता है कि आध्यात्मिक उन्नति और सांसारिक नवाचार एक-दूसरे के पूरक हैं, और उनकी विरासत आज भी मानवता को नैतिकता, बुद्धिमत्ता और अटूट विश्वास की राह पर चलने के लिए प्रेरित करती है।

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