भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के स्वर्णिम इतिहास में प्रीतिलता वाडेदार का नाम एक ऐसी प्रज्वलित मशाल के रूप में दर्ज है, जिसने अपनी वीरता और बलिदान से सोए हुए राष्ट्र में देशभक्ति की नई ऊर्जा फूँक दी थी। 5 मई 1911 को चटगांव के एक साधारण परिवार में जन्मी प्रीतिलता बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि और विद्रोही स्वभाव की थीं। उनके पिता एक नगरपालिका क्लर्क थे, लेकिन अभावों के बीच भी प्रीतिलता ने अपनी शिक्षा में कभी बाधा नहीं आने दी। चटगांव के डॉ. खस्तागीर सरकारी बालिका विद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के बाद, उन्होंने ढाका के ईडन कॉलेज से इंटरमीडिएट किया, जहाँ वे पूरे ढाका बोर्ड में पांचवें स्थान पर रहीं। इसके पश्चात कोलकाता के बेथ्यून कॉलेज से दर्शनशास्त्र में स्नातक की डिग्री प्राप्त करने वाली इस मेधावी छात्रा की देशभक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ब्रिटिश अधिकारियों ने उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण उनकी डिग्री रोक दी थी, जिसे अंततः उनके बलिदान के 80 साल बाद मरणोपरांत प्रदान किया गया।

प्रीतिलता के भीतर क्रांति के बीज स्कूली दिनों में ही पड़ गए थे, जब उन्हें 'बालचर संस्था' में ब्रिटिश सम्राट के प्रति वफादारी की शपथ लेने के लिए मजबूर किया गया, जो उन्हें बेहद नागवार गुजरा। रानी लक्ष्मीबाई के जीवन से प्रेरित प्रीतिलता ने शिक्षा पूर्ण करने के बाद परिवार की आर्थिक सहायता के लिए एक स्कूल में नौकरी तो की, लेकिन उनका लक्ष्य राष्ट्र की मुक्ति था। इसी दौरान उनकी मुलाकात महान क्रांतिकारी सूर्य सेन 'मास्टर दा' से हुई, जिनके नेतृत्व में वे इंडियन रिपब्लिकन आर्मी की एक निर्भीक सिपाही बनीं। उनकी बुद्धिमत्ता और साहस का प्रमाण तब मिला जब उन्होंने अलीपुर जेल में बंद क्रांतिकारी रामकृष्ण बिस्वास से बिना किसी संदेह के लगभग 40 बार मुलाकात की। धालघाट के संघर्ष में जब वे पुलिस से घिर गईं, तब सूर्य सेन के साथ अदम्य साहस दिखाते हुए वे वहां से सुरक्षित निकलने में सफल रहीं, जबकि उनके साथी निर्मल सेन और अपूर्वा सेन शहीद हो गए।

प्रीतिलता के जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ 24 सितंबर 1932 की रात को आया, जब उन्हें चटगांव के 'यूरोपियन क्लब' पर हमले का नेतृत्व सौंपा गया, जिसके बाहर अपमानजनक बोर्ड लगा था— "कुत्तों और भारतीयों का प्रवेश वर्जित है।" सैन्य वेशभूषा में सजी प्रीतिलता ने अपने साथियों के साथ क्लब पर धावा बोल दिया, जिससे वहां मौजूद अंग्रेज अधिकारियों में भगदड़ मच गई। इस भीषण मुठभेड़ के दौरान वे गोली लगने से घायल हो गईं, लेकिन आत्मसमर्पण करने के बजाय उन्होंने अपनी योजना के अनुसार 'पोटेशियम साइनाइड' खाकर मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दे दी। उनके पास से मिले पत्र ने स्पष्ट कर दिया कि उनका यह संघर्ष भारत की पूर्ण स्वतंत्रता तक जारी रहने वाला एक महायज्ञ था। महज़ 21 वर्ष की आयु में उनका यह सर्वोच्च बलिदान आज भी भारतीय इतिहास में साहस और स्त्री शक्ति के एक अद्वितीय प्रतीक के रूप में जीवित है।

Pratahkal HQ

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