भारतीय मध्यकालीन इतिहास के पन्नों में पृथ्वीराज तृतीय, जिन्हें हम पृथ्वीराज चौहान के नाम से जानते हैं, का नाम एक ऐसे प्रतापी शासक के रूप में अंकित है जिन्होंने अपनी वीरता और रणनीतिक कौशल से उत्तर भारत की राजनीति को एक नई दिशा दी। सपादलक्ष साम्राज्य के इस दिग्गज राजा का जन्म गुजरात में चौहान राजा सोमेश्वर और रानी कर्पूरदेवी के यहाँ हुआ था। उनका बचपन चालुक्य दरबार के संरक्षण में बीता, लेकिन नियति उन्हें अजयमेरु (आधुनिक अजमेर) की गद्दी की ओर ले आई। मात्र ग्यारह वर्ष की कोमल आयु में पिता के देहावसान के बाद उन्होंने अपनी माता के कुशल मार्गदर्शन में शासन संभाला और सन् 1180 के आसपास पूर्ण रूप से सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ले ली। पृथ्वीराज का शासनकाल न केवल सैन्य विजयों के लिए, बल्कि राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और पंजाब के विस्तृत भूभागों पर उनके वर्चस्व के लिए भी जाना जाता है। हालांकि ऐतिहासिक रूप से उनकी राजधानी अजमेर थी, लेकिन लोक कथाओं और जनश्रुतियों ने उन्हें हमेशा 'दिल्ली का सुल्तान' और 'अंतिम हिंदू सम्राट' के रूप में प्रतिष्ठित किया, जो पूर्व-इस्लामिक भारतीय सत्ता के सबसे सशक्त स्तंभ थे।

पृथ्वीराज चौहान के जीवन का सफर संघर्षों और अजेय संकल्पों से भरा रहा। अपने शासन के प्रारंभिक वर्षों में उन्होंने चंदेल राजा परमार्दिदेव सहित कई पड़ोसी राज्यों को पराजित कर अपनी सैन्य श्रेष्ठता सिद्ध की। उनके जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ तब आया जब उत्तर-पश्चिम की सीमाओं से मोहम्मद गौरी के नेतृत्व में घोरी राजवंश का संकट मंडराने लगा। सन् 1191 में तराइन के प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज ने अपनी वीरता का ऐसा परिचय दिया कि गौरी की सेना के पैर उखड़ गए और उसे अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा। हालांकि, इतिहास साक्षी है कि एक वर्ष बाद ही सन् 1192 में तराइन का द्वितीय युद्ध हुआ, जिसने भारत का भाग्य बदल दिया। इस युद्ध में मोहम्मद गौरी एक विशाल और सुसज्जित सेना के साथ लौटा, जबकि आंतरिक कलह और पड़ोसी हिंदू राजाओं के सहयोग के अभाव ने पृथ्वीराज की स्थिति को चुनौतीपूर्ण बना दिया। इस भीषण संग्राम में पृथ्वीराज की पराजय हुई और सरस्वती किले के समीप उन्हें बंदी बना लिया गया। उनके अंत को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं; जहाँ मुस्लिम वृत्तांत उन्हें विद्रोह के आरोप में मृत्युदंड दिए जाने की बात करते हैं, वहीं 'पृथ्वीराज रासो' जैसी लोकप्रिय रचनाएँ उनकी 'शब्दभेदी बाण' की कला और गौरी के वध की अमर कथा सुनाती हैं।

पृथ्वीराज चौहान की विरासत किसी एक युद्ध या हार से कहीं बड़ी है। उनके पतन को भारत में इस्लामिक विजय के एक ऐतिहासिक मील के पत्थर के रूप में देखा जाता है, लेकिन उनकी स्मृति आज भी करोड़ों भारतीयों के हृदय में एक देशभक्त योद्धा के रूप में जीवित है। यद्यपि जैन और संस्कृत के कुछ शुरुआती वृत्तांत उन्हें एक असफल शासक के रूप में देखते हैं, किंतु चंद बरदाई की कालजयी रचना 'पृथ्वीराज रासो' ने उन्हें एक ऐसे नायक के रूप में स्थापित किया जिसने अपने स्वाभिमान और मातृभूमि की रक्षा के लिए सर्वस्व न्योछावर कर दिया। आज भी अजमेर और दिल्ली में उनके स्मारक उनकी वीरता की गवाही देते हैं और आधुनिक सिनेमा व साहित्य उन्हें भारतीय राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करता है। पृथ्वीराज चौहान केवल एक राजा नहीं थे, बल्कि वे उस साहस का नाम हैं जो सदियों तक आने वाली पीढ़ियों को अन्याय के विरुद्ध अडिग खड़े रहने की प्रेरणा देता रहेगा।

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