अठारहवीं सदी के भारतीय इतिहास में एक ऐसा नाम दर्ज है, जिसकी वीरता की गूँज आज भी सह्याद्रि की पहाड़ियों से लेकर उत्तर भारत के मैदानों तक सुनाई देती है; यह गाथा है मराठा साम्राज्य के सातवें पेशवा बाजीराव प्रथम की, जिन्होंने अपनी तलवार के दम पर छत्रपति शिवाजी महाराज के 'स्वराज' के सपने को एक विशाल साम्राज्य में बदल दिया। 18 अगस्त 1700 को नासिक के पास सिन्नर में भट्ट परिवार में जन्मे बाजीराव बल्लाल को युद्ध कौशल और कूटनीति विरासत में मिली थी। उनके पिता बालाजी विश्वनाथ, छत्रपति शाहूजी महाराज के पेशवा थे, और बाजीराव ने बचपन से ही किताबी ज्ञान के बजाय रणभूमि के अनुभवों को प्राथमिकता दी। महज 19 वर्ष की आयु में जब उनके पिता का निधन हुआ, तब छत्रपति शाहू ने विरोधियों की परवाह न करते हुए इस तेजस्वी युवा को पेशवा के पद पर नियुक्त किया। बाजीराव का दृष्टिकोण स्पष्ट था; वे मुग़ल साम्राज्य की गिरती हुई नींव को भांप चुके थे और उन्होंने घोषणा की थी कि यदि हम इस जर्जर वृक्ष के तने पर प्रहार करेंगे, तो शाखाएं स्वयं गिर जाएंगी। उनके इस आत्मविश्वास ने मराठा सेना में नए प्राण फूंक दिए।

पेशवा बनते ही बाजीराव के सामने चुनौतियों का पहाड़ था, जिसमें सबसे बड़ा खतरा हैदराबाद का निजाम-उल-मुल्क था। बाजीराव की सैन्य प्रतिभा का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण 1728 का पालखेड़ युद्ध बना, जहाँ उन्होंने अपनी अद्भुत गतिशीलता और गुरिल्ला युद्ध कौशल से निजाम को चारों ओर से घेरकर घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। इसके बाद बाजीराव ने उत्तर की ओर रुख किया और बुंदेलखंड के शासक महाराजा छत्रसाल की पुकार पर मुग़ल सेनापति मोहम्मद खान बंगश को परास्त कर उन्हें जीवनदान दिया। इस विजय के उपलक्ष्य में छत्रसाल ने उन्हें अपनी पुत्री मस्तानी का हाथ सौंपा और बुंदेलखंड का एक तिहाई हिस्सा जागीर के रूप में भेंट किया। बाजीराव का निजी जीवन उनकी दो पत्नियों, काशीबाई और मस्तानी, के साथ काफी चर्चाओं में रहा, किंतु उन्होंने सदैव अपने पारिवारिक कर्तव्यों और राष्ट्र धर्म के बीच संतुलन बनाए रखा। उनकी वीरता का चरमोत्कर्ष 1737 में दिखा, जब उन्होंने मात्र 500 घुड़सवारों के साथ दिल्ली के दरवाजों पर दस्तक देकर मुग़ल बादशाह को भयभीत कर दिया था। इसके तुरंत बाद भोपाल के युद्ध में उन्होंने मुग़ल, निजाम और अवध की संयुक्त सेनाओं को धूल चटाकर मालवा पर मराठा आधिपत्य स्थापित किया।

बाजीराव केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि पुणे शहर के आधुनिक निर्माता भी थे, जहाँ उन्होंने पेशवाओं के निवास 'शनिवार वाड़ा' की नींव रखी। उनके युद्ध कौशल की प्रशंसा आधुनिक युग के प्रसिद्ध सैन्य रणनीतिकारों ने भी की है, जो उनकी अश्वारोही सेना की बिजली जैसी गति को 'रणनीतिक गतिशीलता' का उत्कृष्ट नमूना मानते हैं। निरंतर युद्धों और थकान ने उनके शरीर को जर्जर कर दिया था और महज 39 वर्ष की आयु में, 28 अप्रैल 1740 को नर्मदा नदी के तट पर रावेरखेड़ी में इस महान सेनानायक का निधन हो गया। बाजीराव प्रथम ने अपने 20 वर्षों के कार्यकाल में कभी कोई युद्ध नहीं हारा, जो विश्व इतिहास में एक दुर्लभ कीर्तिमान है। उन्होंने न केवल दक्षिण में मराठा शक्ति को सुदृढ़ किया, बल्कि अटक तक भगवा ध्वज फहराने का मार्ग प्रशस्त कर भारत के मानचित्र पर मराठों को सर्वशक्तिमान बना दिया। उनका साहस और अटूट संकल्प आज भी भारतीय इतिहास के पन्नों में एक स्वर्णिम अध्याय की तरह चमकता है, जो आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रभक्ति और शौर्य की प्रेरणा देता रहता है।

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