मेवाड़ की माटी के शौर्य और बलिदान की गाथा अधूरी है उस महान योद्धा के बिना, जिसने किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रखते ही इतिहास के पन्नों में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित कर दिया। रावत पत्ता चुंडावत, जिन्हें पत्ता सिसोदिया के नाम से भी जाना जाता है, मेवाड़ी साहस का वह जीवंत प्रतीक थे जिन्होंने मात्र 16 वर्ष की आयु में चित्तौड़गढ़ दुर्ग की रक्षा का उत्तरदायित्व संभाला। कैलवा की जागीर के शासक पत्ता का जीवन बचपन से ही संघर्षों और उत्तरदायित्वों से घिरा रहा। सन् 1555 में जब उदयपुर के समीप एक युद्ध में उनके पिता वीरगति को प्राप्त हुए, तब मात्र 4 वर्ष की कोमल आयु में उन्हें कैलवा का शासन सौंपा गया। महाराणा उदय सिंह द्वितीय के प्रति उनकी अटूट निष्ठा और असाधारण युद्ध कौशल का ही परिणाम था कि 1567 में जब मुगल सम्राट अकबर ने चित्तौड़गढ़ का घेरा डाला, तो महाराणा ने उन पर अटूट विश्वास जताते हुए उन्हें दुर्ग के प्रमुख कमांडरों में से एक नियुक्त किया।

चित्तौड़गढ़ का वह ऐतिहासिक घेराबंदी भारतीय इतिहास के सबसे भीषण संघर्षों में से एक थी, जहाँ मुगल सेना की विशाल शक्ति के सामने पत्ता सिसोदिया और जयमल राठौड़ जैसे वीर दीवार बनकर खड़े हो गए। जब दुर्ग के गवर्नर जयमल राठौड़ वीरगति को प्राप्त हुए, तब दुर्ग की रक्षा का संपूर्ण भार पत्ता सिसोदिया के कंधों पर आ गया। उस संकटपूर्ण घड़ी में पत्ता ने न केवल सैन्य संचालन किया, बल्कि उनके नेतृत्व में ही जौहर की अग्नि प्रज्वलित हुई। पत्ता सिसोदिया, ऐस्सर दास चौहान और साहिब खान के आवासों में दुर्ग की क्षत्राणियों ने अपने सतीत्व की रक्षा के लिए अग्नि में स्वयं को समर्पित कर दिया। इसके पश्चात केसरिया बाना पहनकर पत्ता अपने मुट्ठी भर सैनिकों के साथ मुगल सेना पर टूट पड़े। 'अकबरनामा' के अनुसार, जब अकबर विजय के पश्चात दुर्ग में प्रवेश कर रहा था, तब एक हाथी ने अनजाने में एक घायल योद्धा को कुचल दिया। जब महावत उस व्यक्ति को सम्राट के सम्मुख लाया, तब पता चला कि वह कोई साधारण सैनिक नहीं बल्कि स्वयं सेनापति पत्ता सिसोदिया थे। उस समय उनमें जीवन की अंतिम सांसें शेष थीं और कुछ ही क्षणों में उन्होंने रणभूमि में वीरगति प्राप्त की। पत्ता सिसोदिया का बलिदान केवल एक योद्धा की मृत्यु नहीं, बल्कि मेवाड़ी अस्मिता और स्वतंत्रता के प्रति उस अडिग संकल्प की विजय थी, जिसने आने वाली पीढ़ियों को महाराणा प्रताप के संघर्ष के लिए प्रेरित किया।

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